योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि भी स्वाभाविक है । और लोगों को यह दृष्टि यत्न से प्राप्त होती है, पर ज्ञानवान् को स्वाभाविक होती है । जिसको तुम इच्छा कहते हो, वह ज्ञानवान् को सब भ्रमरूप है और अनिच्छा भी ब्रह्मरूप भासित होती है । ज्ञानवान् को आत्मानन्द प्राप्त हुआ है । वह अपने स्वभाव में सदा स्थित है, इससे उसको कोई कल्पना नहीं उठती और वह विद्यमान निवारण दृष्टि लेकर स्थित होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्वैतैकताऽभाववर्णनं नाम द्विशताधिकपञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे स्वप्न में जो पृथ्वी आदि पदार्थ दिखते हैं, वे अविद्यमान हैं-कुछ हैं नहीं, वैसे ही पितामह आदि ब्रह्मा को भी आकाशरूप जानो । वह भी कुछ हैं नहीं, अर्थात् आत्मसत्ता से भिन्न हुए नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले स्वाभाविक हैं, और तरङ्ग शब्द कहना भी उनको नहीं बनता, वे तो जलरूप हैं, वैसे ही जिनको तुम ब्रह्माजी कहते हो, वह और कोई नहीं, आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । ब्रह्माजी ही विराट् हैं । जैसे पत्ते, फूल, फल और डाल वृक्ष के अङ्ग हैं, वैसे ही सब भूत उस विराट् के अङ्ग हैं । जब (विराट्) ब्रह्मा ही आकाशरूप हैं, तब उनके अङ्ग जगत् की वार्ता क्या कहिये ? हे राम ! विराट् के न प्राण है, न आकार है, न इन्द्रियाँ हैं, न मन है, न बुद्धि है और न इच्छा है । केवल अद्वैत चिन्मात्र-सत्ता अपने आपमें स्थित है । जब विराट् ही नहीं, तब जगत् कैसे हो ? जो तुम कहो कि आकाशरूप के अंग कैसे दिखते हैं, तो हे राम ! जैसे स्वप्न में बड़े पहाड़ प्रत्यक्ष दिखते हैं, परन्तु कुछ बने नहीं, आकाशरूप हैं, वैसे ही आदि-विराट् भी कुछ बना नहीं, आकाशरूप है । तब उसके अङ्ग में आकाररूप कैसे कहूँ ? सब आकार संकल्पपुर की नाईं कल्पित हैं । एक आत्मसत्ता ही सर्वदा ज्यों की त्यों स्थित है । उसमें स्मृति और अनुभव क्या कहिये ? अनुभव और स्मृति भी उसी का आभास है । जैसे समुद्र में तरङ्ग आभास होते हैं, वैसे ही आत्मा में अनुभव और स्मृति भी आभास है । स्मृति भी उसकी होती है,