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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1618, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1618

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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और फिर सुषुप्ति में वह लीन हो जाता है, तो उपजा क्या और लीन क्या हुआ ? स्वप्न के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी वही रही। मध्य में जो कुछ दिखा, वह भी वही रूप हुआ, आत्मा से भिन्न तो कुछ न हुआ। इसलिए सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है-ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। हे राम ! मुझको तो सदा अनुभवरूप जगत् दिखता है। मैं नहीं जानता कि अज्ञानी को क्या दिखता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि से जो जागा है, उसको अद्वैत अपना रूप दिखता है, वैसे ही तुरीयावस्था में दिखता है। तुरीय और जाग्रत् में कुछ भेद नहीं, जाग्रत् ही तुरीय का नाम है और जाग्रत् तुरीयरूप है। बल्कि यह भी क्या कहना है, सभी अवस्थाएँ तुरीयरूप हैं।

तुरीय जाग्रत्सत्ता का नाम है। जो अनुभव की साक्षी ज्योति है, वह जाग्रत् में भी साक्षीरूप है, स्वप्न में भी साक्षीरूप है और सुषुप्ति में भी साक्षीरूप है। इसलिए सब तुरीयरूप है। परन्तु जिसको स्वरूप का अनुभव हुआ है, उस ज्ञानवान् को ऐसे ही दिखता है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ दिखती हैं। हे राम ! एक पदार्थ का वृत्ति ने त्याग किया, पर वह दूसरे पदार्थ में नहीं लगी। वह जो मध्य में अनुभव ज्योति है, उसको तुम आत्मसत्ता जानो और उसमें जो फिर कुछ भासित हुआ उसे भी वही रूप जानो। जैसे जाग्रत् को त्यागकर स्वप्न का आदि साक्षी अनुभवमात्र होता है और उस सत्ता में स्वप्न का शरीर पदार्थ भासित होते हैं, वे भी आत्मरूप हैं, वैसे ही जो कुछ जाग्रत् शरीर और पदार्थ दिखते हैं, वे आत्मरूप हैं। जब तुम ऐसे जानोगे, तब तुमको कोई दुःख स्पर्श न करेगा। जैसे स्वप्न की सृष्टि में अपने स्वरूप की स्मृति आने से दुःख भी सुख होता है और बोलना-चालना, खाना, पीना, देना, लेना आदि शब्द और अर्थ और द्वैतरूप युद्ध-कर्म सब अद्वैत अपने आप हो जाते हैं, और जीव व्यवहार भी सब करता है, परन्तु उसके अपने निश्चय में कुछ नहीं फुरता, वैसे ही जो पुरुष अपने स्वरूप में जागे हैं; उनको सब जगत् आत्मरूप ही दिखता है। जैसे अग्नि में उष्णता और बर्फ में शीतलता स्वाभाविक है, वैसे

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