योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1617, कुल 1734 में से
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है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि अज्ञानी सत्य को असत्य और असत्य को सत्य जानते हैं। जो अनुभव-सत्ता है, उसको छिपाते हैं और खरगोश के सींग सरीखे जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। वे मूर्ख हैं। सबका प्रकाशक आत्मसत्ता है। जिसको तुम सूर्य देखते हो, वही परमदेव सूर्य होकर दिखता है। चन्द्रमा और अग्नि उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। निदान सबका प्रकाश और तेजसत्ता वही है। जैसे सूर्य की किरणों में सूक्ष्म अणु होते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में सूर्यादिक दिखते हैं। जिनको साकार और निराकार कहते हो, वह सब खरगोश के सींग से हैं। ज्ञानवान् को ऐसे ही दिखता है कि जगत् कुछ उपजा नहीं, तो मैं क्या कहूँ? जहाँ सब शब्दों का अभाव हो जाता है और उसके पीछे चिन्मात्रसत्ता शेष रहती है, वहाँ शून्य का भी अभाव हो जाता है।
हे राम! जिसको तुम जीता कहते हो, उनमें जीता भी कोई नहीं और जो जीता नहीं तो मरा कैसे हो ? जो कहिये जीता है तो जैसे जीता है, वैसे ही मृतक है। मृतक और जीते में कुछ भेद नहीं। इसलिए सब शब्दों से रहित और सबका अधिष्ठान वही सत्ता है। उसमें नानात्व दिखता भी है, परन्तु हुआ कुछ नहीं। पर्वत जो स्थूल दिख आते हैं, वे अणुमात्र भी नहीं—जैसे स्वप्न में पृथ्वी आदि तत्त्व दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसी में जगत् दिखता है। हे राम! जो परमार्थसत्ता से जगत् प्रकट हुआ, वह तो और कुछ न हुआ। इसलिए वही सत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। कोई कहते हैं कि आत्मा में है और कोई कहते हैं कि आत्मा में कुछ नहीं है, पर आत्मा में दोनों शब्दों का अभाव है, बल्कि अभाव का भी अभाव है। यह भी तुम्हारे जानने के लिए कहता हूँ। वह तो स्वस्थ और परम शान्तरूप है। उसमें और तुममें कुछ भेद नहीं है। वह परिपूर्ण, अच्युत, अनन्त और अद्वैत है। वही जगतरूप होकर दिखता है। जैसे कोई पुरुष शयन करता है तो सुषुप्ति में अद्वैतरूप हो जाता है, फिर सुषुप्ति से स्वप्न फुर आता है