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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1616, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1616

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८१३

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् वास्तव में ज्ञानस्वरूप और आत्मसत्ता का चमत्कार है। और कुछ बना नहीं, ब्रह्मसत्ता ही फुरने से इस प्रकार होकर भासित होती है। इसका कारण भी कोई नहीं। जब महाप्रलय था, तब शब्द-अर्थ द्वैत कुछ न था। उस अद्वैतसत्ता से जगत् प्रकट हुआ है। जैसे बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, वह बीज भी जगत् का कोई न था, तो किस कारण से वह उत्पन्न हुआ और तो कोई कारण न था। इससे अब भी जगत् को महाप्रलयरूप जानो। हे राम! न कोई पृथ्वी आदि तत्त्व है, न जगत् है, न आभास है और न सृष्टि है। जैसे आकाश के फूलों में सुगन्ध नहीं होती, वैसे ही इनका होना भी नहीं है। केवल स्वच्छ ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। रूप इन्द्रियाँ और मन भी ब्रह्मस्वरूप है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव है और मन ही नाना प्रकार का जगत् और इन्द्रियाँ होकर दिखता है, और कुछ नहीं है वैसे ही यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! सब जगत् आत्मरूप है। जैसे कारण बिना आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, सो वास्तव में है नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है, और जिसमें यह आभास प्रकट हुआ है, वह अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। ये सब पदार्थ जो तुमको दिखते हैं, उन्हें ब्रह्मस्वरूप जानो। जैसे मनोराज्य की सृष्टि अपने अनुभव में होती है और उसका स्वरूप अनुभव से भिन्न नहीं होता, वैसे ही सृष्टि के आदि में जो अनुभव होता है, वह अनुभवरूप है। और कुछ उपजा नहीं—वही अनुभवसत्ता इस प्रकार भासित होती है।

हे राम! देश से देशान्तर को जो संवित् प्राप्त होती है, उसमें जो अनुभव है वही तुम्हारा स्वरूप है, और सब आभासमात्र है। जाग्रत् देश को त्यागकर जो स्वप्न शरीर के साथ नहीं मिली, और जाग्रत् स्वप्नदेश के मध्य में जो ब्रह्मसत्ता है, वही तुम्हारा स्वरूप है। वह प्रकाशरूप और अपने आपमें स्थित है। जाग्रत् जो दिखता है, वह भी उसी का स्वभाव है। जैसे रत्नों का स्वभाव चमकना है, अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का स्वभाव द्रव है और पवन का स्वभाव चलना है, वैसे ही ब्रह्म का स्वभाव जगत् है। जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता