योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1615, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८१२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️
करते हैं। मुदिता उसकी स्त्री है—सदा प्रसन्न रहने का नाम मुदिता है— जो वंदनीय है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा को देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं। मुदितारूपी स्त्री के साथ करुणा और दया नाम की एक सहेली रहती है। समतारूपी द्वारपालनी सम्मुख खड़ी रहती है। जब विवेक राजा अन्तःपुर में आता है, तब वह सम्मुख होकर सब स्थान दिखाती है और सदा साथ रहती है। जिस ओर राजा देखता है, उस ओर समता ही देख पड़ती है, जो आनन्द उपजानेवाली है। वह धैर्य और धर्म नाम के दो पुत्र साथ लेकर पुरी में विचरती है और जिस ओर राजा भेजता है, उस ओर उन्हें लिए फिरती है।
जब राजा सवार होकर चलता है, तब वह भी समतारूपी वाहन पर चढ़कर राजा के साथ जाती है। जब राजा विषयरूपी पाँचों शत्रुओं से लड़ाई करता है, तब धैर्य और संतोष मन्त्री मन्त्र देते हैं और विचाररूपी बाण से उनको नष्ट करते हैं। हे राम! विचार सदा उसके संग रहता है और सब कार्य करता है। यह चेष्टा उसकी स्वाभाविक होती है। वह आप सदा अमान रहता है। उसको कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। जैसे कागज पर लिखी मूर्ति अभिमान से रहित होती है, वैसे ही वह भी अभिमान से रहित है और परमार्थनिरूपण से रहित निरर्थक वचन नहीं बोलता, जैसे पत्थर कुछ नहीं कहता- सुनता। जिस क्रिया का शास्त्रों और लोगों ने निषेध किया है, उसे नहीं करता। जैसे शव कुछ क्रिया नहीं करता, वैसे ही उसको क्रिया का उत्थान नहीं होता। जहाँ ज्ञानियों और जिज्ञासुओं की सभा होती है, वहाँ वह शेषनाग और बृहस्पति की तरह परमार्थ का निरूपण करता है। सावधानता इत्यादि शुद्ध क्रियाएँ उसमें स्वाभाविक होती हैं, जैसे सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि में प्रकाश स्वाभाविक होता है, वैसे ही उसमें शुभ क्रियाएँ स्वाभाविक होती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तिप्राप्तलक्षणव्यवहार- वर्णनं नाम द्विशताधिकचतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५४ ॥