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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1614, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1614
  • निर्वाण प्रकरण * ८११

मल को जलानेवाली अग्नि है। जैसे अग्नि सुवर्ण के मैल को जला-कर उसे निर्मल बनाती है, वैसे ही विचाररूपी अग्नि राग-द्वेषरूपी मल को जलाती है। जब विचाररूपी मित्र आता है, तब स्वाभाविक चेष्टा निर्मल हो जाती है और वह वेदोक्त मार्ग में विचरता है। तब सब कोई उसको देखकर प्रसन्न होते हैं और दया, कोमलता, अमान और अक्रोध आदि गुण उसे प्राप्त होते हैं। जैसे तिलोँ में तेल, फूल में सुगन्ध और अग्नि में गर्मी रहती है, वैसे ही विचार में शुभ आचार रहते हैं। विचाररूपी मित्र शूर है। जो कोई शत्रु होता है, उसको वह पहले मारता है और अज्ञानरूपी शत्रु का नाश करता है—जैसे सूर्य तम का नाश करता है। फिर वह दीपक के प्रकाश-सा साथ होता है, विषय-भोगरूपी अन्धे कूप में गिरने नहीं देता और सब ओर से रक्षा करता है। जिस ओर वह पुरुष जाता है, उस ओर सबको प्रसन्नता होती है। हे राम ! उसकी वाणी कोमल, मधुर और स्निग्ध होती है। वह उदाराशय क्षोभ से रहित होकर लोगों का उपकार करता है, और वाणी से सबको प्रसन्न रखता है। वह सौहार्द, शान्ति और परमार्थ का कारण है। हे राम ! वचन तो उसके प्रसन्नता के लिए होते हैं और वह आप भी सदा प्रसन्न रहता है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने भर्ता को सदा प्रसन्न रखती है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको सदा प्रसन्न रखता है और शुभ आचार में चलाता है। दान, तप, यज्ञादिक शुभ कर्म वह आप भी करता है और लोगों से भी कराता है। जब अन्तःकरण में विवेकरूपी मन्त्री आता है तब वह वहाँ अपने परिवार को भी साथ ले आता है।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! उसका परिवार कौन है ? उसका स्वरूप और क्या आचार है ? संक्षेप से कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्नान, दान, तपस्या और ध्यान, ये चारों उसके बेटे हैं। स्नान यह है कि सदा पवित्र रहे। यथायोग्य और यथाशक्ति दान करे, यह दान है। बाहर की वृत्ति को भीतर स्थित करने का नाम तप और आत्मा में चित्तवृत्ति लगाने का नाम ध्यान है। ये चारों उसके बेटे हैं। ये आत्मदर्शी हैं, परन्तु वृत्ति को सदा स्वाभाविक अन्तर्मुख करके व्यवहार

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1614, कुल 1734 में से · BharatKosha