योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1613, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें= १० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है। प्रकट में वे सोते हैं, पर सुषुप्ति में जागते हैं और जाग्रत् से उनको सुषुप्ति है। उस सुषुप्ति से वे सोये हैं और कर्म करते हैं, परन्तु कर्त्ता-कारणभाव से रहित हैं। क्रोध भी करते हैं। परन्तु क्रोध के स्फुरण से रहित हैं। सब ओर से प्रकाशवान् निर्भय होकर विश्राम करते हैं। कामना करते भी दिखते हैं, परन्तु तृष्णा से रहित हैं और निस्संकल्प पद में स्थित हुए हैं। यह आश्चर्य है कि जिस क्रिया की ओर वे देखते हैं, उसी ओर उनको शान्ति दिखती है, क्योंकि एक मित्र उनके साथ रहता है। इससे कोई दुःख उनके निकट नहीं आता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५३ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह मित्र कौन है ? ज्ञानी का कोई कर्म मित्र है अथवा आत्मा में विश्राम का नाम मित्र है; यह संक्षेप में मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निष्काम कर्म ही वह अपना मित्र है अर्थात् अपना ही प्रयत्न उनका मित्र है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ये तीनों ताप सदा अज्ञानी को जलाते हैं, पर ज्ञानी को नहीं। जो बड़ा कष्ट और बहुत कोप भी उनको स्पर्श नहीं करता। जैसे कमल को जल नहीं स्पर्श करता, वैसे ही ज्ञानी को कष्ट नहीं स्पर्श करता, क्योंकि वह मित्र उसके साथ रहता है। जैसे बालक का मित्र बालक होता है, सो बड़े होने पर भी उसका हितू होता है, वैसे ही चिरकाल से ज्ञानवान् ने जो अभ्यास किया है, वही उसका मित्र होकर साथ देता है और दुष्ट क्रिया की ओर उसे नहीं प्रवृत्त होने देता, शुभ कर्म की ओर प्रवृत्त करता है। जैसे पिता पुत्र को अशुभ की ओर से वरजकर शुभ की ओर लगाता है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको तृष्णा से बर्जन करता है और आत्मा की ओर लगाता है। वह राग-द्वेषरूपी अग्नि से निकालकर समतारूपी शीतलता उसे देता है। ऐसा विचाररूपी उसका मित्र उसे सब दुःख क्लेशादिक से उबार ले जाता है—जैसे मल्लाह नदी के पार ले जाता है।
हे राम ! विचाररूपी मित्र बहुत सुन्दर है, शान्तरूप है। वह सब