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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1612, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1612

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

८०६

उन मुक्त पुरुषों को संसार का दुःख-सुख व्याप नहीं सकता, क्योंकि वे परम अद्वैत शुद्ध सत्ता को प्राप्त हुए हैं। वे सबको देखते हैं। ग्रहण-त्याग-रूपी अग्नि को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और सदा उसी में सोये रहते हैं। वास्तव में सुख से वे ही सोते हैं और उनके भीतर सदा शान्ति रहती है। परन्तु वे जड़ता से रहित हैं और आकाश से भी अधिक सूक्ष्म सत्ता को प्राप्त हुए हैं। जैसे समुद्र में धूल नहीं होती और सूर्य में अंधकार नहीं होता, वैसे ही उनमें इन्द्रियों के इष्ट विषयों की तृष्णा नहीं होती। उन विषयों से रहित होकर उन्होंने विश्राम पाया है। यह आश्चर्य है कि अणु से अणु और महत् से महत् होकर भी वे केवल विश्राम को प्राप्त हुए हैं। हे राम! जो आत्मसत्ता की ओर से सोये पड़े हैं, उनको दुःख होता है। पर ज्ञानवान् द्वैत जगत् की ओर जड़ हुए हैं और अपने स्वरूप में स्थित हैं, इससे उनको दुःख कुछ नहीं। वे जाग्रत् की ओर से सोये हैं। उनका अविद्याकृत जगत् और दृश्य का सम्बन्ध दूर हो गया है। जब वे इस ओर से सोये हैं तो उनको फिर दुःख कैसे हो?

वे पुरुष सदा अद्वैतरूप हैं। वे अनन्त जगत् के कर्त्ता हैं और अपने को सदा अकर्त्ता जानते हैं, ऐसे आश्चर्यपद में उन्होंने विश्राम पाया है। जगत् के समूहसत्ता समान में स्थित होकर उन्होंने विश्राम पाया है, यह आश्चर्य है। वे सब किया करते हैं, परन्तु सदा अक्रियपद में स्थित हैं और सम्पूर्ण पदार्थों स्वप्नवत् जानकर सुषुप्त हुए हैं। वे आकाश से भी अधिक सूक्ष्म हैं, क्योंकि आत्मसत्ता में विश्राम पाया है। वह आत्मसत्ता आकाश को भी व्याप रही है; उसी को आत्मवत् जानकर वे स्थित हुए हैं। जो परम स्वच्छ पद है, उसमें सब शब्द अर्थ आकाशरूप हो जाते हैं और आकाश भी आकाश हो जाता है। उस पद में उन्होंने विश्राम किया है, यही आश्चर्य है। नेत्र उनके खुले हुए हैं, पर सुषुप्ति में स्थित हैं। ऐसी सुषुप्ति है कि उनका दृग् और दृश्य-भाव दूर हो गया है। वे जगत् के प्रकाश से रहित और परम प्रकाशरूप हैं। हे राम! वे बाहर के भोग्य पदार्थों से रहित हैं और आत्मा में स्थित