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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1611, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1611

८०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अद्वैत में दृढ़ हुई है, उसे द्वैतरूप पदार्थ नहीं भासित होते। जिनको द्वैत नहीं दिखता, उनको सुख-दुःख कैसे लगे। उन पुरुषों ने वहाँ विश्राम किया है, जहाँ न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। वे सब द्वैत से रहित अद्वैतरूपी शय्या में विश्राम कर रहे हैं और संसार मार्ग को नाँघ गये हैं।

आत्मा के प्रमाद से जीव को कष्ट होता है। जो अपनी विभूति विद्या को त्यागकर प्रसन्न होता है और फिर संसार के क्रूरमार्ग में कष्ट पाता है, वह मनुष्य नहीं, मानो मृग है। वह संसाररूपी वन में भटकता कष्ट पाता है। जब प्यास से व्याकुल होता है, तब जल की ओर दौड़ता है। पर जहाँ जाता है, वहाँ मरुस्थल की नदी मृगमरीचिका ही दिखती है, जल नहीं प्राप्त होता। तब आगे दौड़ता है और प्यास अधिक बढ़ती जाती है। इस प्रकार दौड़ता-दौड़ता जड़ हो जाता है और दुखी होकर मर जाता है, परन्तु उसे जल नहीं प्राप्त होता। यह जल, दौड़ना, जड़ता और मरना चारों अलग-अलग सुनो। हे राम! मन ही मृग है, जो संसाररूपी वन में आ पड़ा है। यह इन्द्रियों के विषयरूपी जलाभास को सत्य जानकर शान्ति के लिए तृष्णारूपी मार्ग में दौड़ता है, पर वे विषय आभासमात्र हैं और उनमें शान्ति रूपी जल नहीं है, इसलिए वह दौड़ता-दौड़ता जब वृद्ध अवस्था में पड़ता है, तब जड़ होकर बड़े कष्ट को प्राप्त होता है, पर शान्तिरूपी जल नहीं पाता, इससे तृप्त भी नहीं होता। हे राम! मनुष्य मानों मजदूर है, जिसके सिर पर बड़ा भार है। वह अटपटे मार्ग में चला जाता है, जहाँ उसको चोर ने लूट लिया है, इससे दुखी होता है। हे राम! मनुष्य-रूपी मजदूर के शीश पर जन्म का बड़ा भार है। यह संशयरूपी अट-पटे मार्ग में खड़ा है। कर्मइन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषय हैं। इनसे रागद्वेषरूपी चोर ने विचाररूपी धन हर लिया है, इससे वह रागद्वेष और तृष्णारूपी अग्नि से जलता है। बड़ा आश्चर्य है कि ज्ञानी लोग ऐसे कुमार्ग को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और अन्य आनन्द को त्यागकर परमपद को आनन्द को प्राप्त हुए हैं।