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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1610, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1610

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८०७

अचैत्य चिन्मात्रस्वरूप है, भेदभाव को नहीं प्राप्त हुआ। और विकार- वान् भी दिखता है, परन्तु विकार नहीं हुआ। जैसे स्वप्न में जीव आप ही सब स्पष्ट दिखाते हैं, वैसे ही यह जगत् अपने आपमें दिखता है, परन्तु कुछ नहीं है। हे राम! यही आश्चर्य है कि मैंने अपने अनु- भव को प्रकट करके उपदेश किया है; जीव आप भी जानते हैं, स्वप्न में नित्य देखते हैं और सुनते भी हैं, परन्तु निश्चय करके जान नहीं सकते और स्वप्न के पदार्थों को मूर्खता से त्याग नहीं सकते।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शालभञ्जनकोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो पुरुष इन्द्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुःख नहीं मानता इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता, उसको जीवन्मुक्त जानो। हे राम! सब शब्द अर्थ जिसका द्वैतरूप नहीं दिखते, उसे तुम जीवन्मुक्त जानो। जिस अविद्यारूपी जाग्रत् में अज्ञानी जागते हैं, उसमें ज्ञानवान् सो रहे हैं और परमार्थरूपी जाग्रत् में अज्ञानी सो रहे हैं। वे नहीं जानते कि परमार्थ क्या है? परन्तु उसमें जीवन्मुक्त स्थित है। इस कारण ज्ञानवान् इष्ट- अनिष्ट विषयों को पाकर सुखी और दुखी नहीं होते। उनका चित्त सदा आत्मपद में स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो पुरुष सुख पाकर सुखी और दुःख से दुःखी नहीं होता, वह तो जड़ हुआ। चैतन्य तो न हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सुख-दुःख तब तक होता है, जबतक चित्त को जगत् का सम्बन्ध होता है। जब चित्त जगत् के सम्बन्ध से रहित चिन्मात्र होता है, तब उपाधिकृत सुख-दुःख नहीं रहते। जो अपने स्वभाव में स्थित पुरुष हैं, ये परम विश्राम को प्राप्त होते हैं और सब कुछ करते हैं, परन्तु स्वरूप से उनको कर्तव्य का उत्थान कुछ नहीं होता, और सदा अद्वैत में निश्चय रहता है। नेत्रों से वे देखते हैं, परन्तु द्वैत की भावना उनको नहीं फुरती। जैसे अत्यन्त उत्तम को सब पदार्थ दिखते हैं, परन्तु सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही जिसकी बुद्धि