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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1609, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1609

८०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे उसमें जगत् आभास है, वैसे ही स्मृति-अनुभव भी आभास है । स्मृति जो संस्कार है उससे जगत् की उत्पत्ति तब कहिये, जब स्मृति आभास न हो । स्मृति-संस्कार भी तो आभास है, फिर वह जगत् का कारण कैसे हो सकती है ? स्मृति भी तब होती है, जब प्रथम जगत् होता है । जब जगत् ही नहीं तो स्मृति कैसे हो ? इससे जगत् आभासमात्र है । इसका कारण कोई नहीं ।

हे राम ! स्मृति-संस्कार जगत् का कारण तब हो, जब कुछ जगत् आगे हुआ हो । सो तो कुछ हुआ नहीं । और अनुभव उसका होता है, जो पदार्थ भासित होता है । सो इस जगत् के आदि में कुछ जगत् का अंश न था, फिर अनुभव कैसे कहूँ ? जो अनुभव ही न हुआ तो स्मृति किसको हो और जब स्मृति ही न हुई तो फिर उससे जगत् कैसे कहूँ ? इसलिए हे राम ! आदि-जगत् अकारण अकस्मात् उपजा है । जैसे रत्न की चमक होती है, वैसे ही जगत् है । यह पीछे से कारण-कार्य रूप भासित होता है । इससे हे राम ! जिसका कारण कोई न हो, उसे जानिये कि उपजा नहीं । वह जिसमें दिखता है, वही रूप है । अधिष्ठान से भिन्न कुछ नहीं । सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । स्मृति भी भ्रम में आभास जगा है और अनुभव भी आभास है । सो ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । और आभास भी कुछ उपजा नहीं, आभास की नाईं जगत् दिखता है—आत्म-सत्ता अद्वैत है, जिसमें आभास, स्मृति, अनुभव, जाग्रत् और स्वप्न की कल्पना कुछ नहीं तो क्या है ? ब्रह्म ही है । फुरना जिसे कहते हैं, वह कुछ वस्तु नहीं है । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही स्पन्दन चैतन्य आत्मा में जगत् की कल्पना करता है । शिल्पी तो आप भिन्न होकर कल्पना करता है, और यह चित्तसत्ता ऐसी है कि अपने ही स्वरूप में कल्पना करती है और जगतरूपी पुतलियाँ देखती है । आत्मा आकाशरूपी खंभा है, उसमें जगत् भी आकाशरूपी पुतलियाँ हैं । जैसे आकाश अपने आकाशभाव में स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने ब्रह्मभाव में स्थित है । जगत् भिन्न भी दिखता है परन्तु