योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८७
वह जन्ममरण-संसार में अपने को डालता है। वह अपना आप ही शत्रु है। जो यत्न करके अपना उद्धार करता है, वह अपने ऊपर दया करता है। हे राम ! जो इन्द्रियों के विषयरूपी कीचड़ में गिरा हुआ है और अपने ऊपर दया नहीं करता, वह महा अज्ञान तम को प्राप्त होता है। जो पुरुष इन्द्रियों को जीतकर आत्मपद में स्थित नहीं होता, उसको शान्ति भी नहीं मिलती। जब बाल-अवस्था होती है, तब शून्यबुद्धि होती है; वृद्धावस्था में अङ्ग क्षीण हो जाते हैं और यौवन अवस्था में इन्द्रियों को नहीं जीत सकता, तो फिर कब कुछ करेगा ? जो तिर्यक् आदि योनियाँ हैं, वे मृतकवत हैं। यत्न का समय यौवनअवस्था है, क्योंकि बालअवस्था तो जड़ मूढ़रूप है और वृद्धअवस्था महानिर्बल सी है। उसमें अपने अङ्ग ही उठाने कठिन हो जाते हैं। तो विचार का क्या फल हुआ-वह तो बालकवत है। इससे यौवन अवस्था में ही कुछ यत्न हो सकता है। जो इस अवस्था में लम्पट रहा, वह महाअनिष्ट नरक को प्राप्त होगा। हे राम ! विषयों से प्रसन्न न होना। यह शरीर नाशरूप है तो विषय क्यों भोगे ? वेद-शास्त्र सुनकर भी जानता है और अनुभव करके भी जानता है कि यह शरीर नाशवान् है। पर उसी शरीर में सत्य की भावना करके जो विषयों के सेवन का यत्न करता है उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। वास्तव में वही सच्चा मूर्ख है। इससे जो इन्द्रियों को जीतेगा, वह फिर जन्म न पावेगा। हे राम ! तुम जागो और अपने को अविनाशी और अच्युत परमानन्दरूप जानो। यह जगत् मिथ्या है-इसको त्याग दो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकषट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४६ ॥
श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! तुम सत्य कहते हो कि इन्द्रियों को जीते बिना शान्ति नहीं होती। इससे इन्द्रियों को जीतने का उपाय कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष को बड़े भोग प्राप्त हुए हैं और उसने इन्द्रियों को जीता नहीं तो वह शोभा नहीं पाता। जो त्रिलोकी का राज्य प्राप्त किया और इन्द्रियाँ न जीतीं तो उसकी कुछ
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प्रशंसा नहीं। जो बड़ा शूरवीर है, पर उसने इन्द्रियों को नहीं जीता, उसकी भी शोभा कुछ नहीं। जिसकी बड़ी आयु है, पर उसने इन्द्रियाँ नहीं जीतीं तो उसका वह जीना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार इन्द्रियाँ जीती जाती हैं और आत्मपद प्राप्त होता है, सो सुनो। हे राम! इस पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य चिन्मात्र है। उसमें जो संवित् जगी है, उस ज्ञानसंवित् का अन्तःकरण और दृश्य जगत् से सम्बन्ध हुआ है—उसी का नाम जीव है। जहाँ से चित्त जगता है, वही चित्त को स्थिर करो, तब इन्द्रियों का अभाव हो जावेगा। इन्द्रियों का नायक मन है। जब मनरूपी मतवाले हाथी को वैराग्य और अभ्यासरूपी जंजीर से जकड़ कर वश करो, तब तुम्हारी जय होगी और इन्द्रियाँ रोकी जा सकेंगी। जैसे राजा को वश करने से सब सेना भी वश हो जाती है, वैसे ही मन को स्थिर करने से सब इन्द्रियाँ वश हो जावेंगी। हे राम! जब इन्द्रियों को वश करोगे, तब शुद्ध आत्मसत्ता तुमको भासित होगी। जैसे वर्षाकाल के न रहने पर शरत्काल में शुद्ध निर्मल आकाश दिखता है कुहरे और बादल का अभाव हो जाना है, वैसे ही जब मनरूपी वर्षाकाल और वासनारूपी कुहरे का अभाव हो जायगा, तब पीछे शुद्ध निर्मल आत्मसत्ता ही भासित होगी। हे राम! ये सब पदार्थ जो जगत् में दिखते हैं, वे असत्य हैं—जैसे मरुस्थल की नदी असत्य होती है—इनमें तृष्णा करना अज्ञान है। जो पदार्थ प्रत्यक्ष प्राप्त हों, उनको त्यागकर जब आत्मा की ओर वृत्ति आवे, तब जानिये कि मुझको इन्द्र का पद प्राप्त हुआ है।
विषयों में आसक्त होना ही बड़ी कृपणता है। इनसे उपराम होना ही बड़ी उदारता है। इससे मन को वश करो, जिसमें तुम्हारी जय हो। जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ में पृथ्वी जब तपती है, तब जो पैर में जूता होता है, तो तपन नहीं लगती, वैसे ही अपना मन वश करने से जगत् आत्मरूप हो जाता है। हे राम! जिस प्रकार जनेन्द्र ने मन को वश किया था, वैसे ही तुम भी मन को वश करो। जिस-जिस ओर मन जावे, उस-उस ओर से उसे रोको। जब दृश्य जगत् की ओर से मन को
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रोकोगे, तब वृत्ति संवित् ज्ञान की ओर आवेगी। जब संवित् ज्ञान की ओर आई तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का अनुभव होगा। तीर्थ, दान और तप करके संवित् का अनुभव होना कठिन है, परन्तु मन को स्थिर करने से सुगम ही अनुभव की प्राप्ति होती है। मन स्थिर करने का उपाय यही है कि सन्तों की संगति करे और रात-दिन सत्शास्त्रों को विचारे। सर्वदा यही उपाय करने से शीघ्र ही मन स्थिर होता है, और जब मन स्थिर होता है, तब आत्म-पद का अनुभव होता है। जिसको आत्मपद प्राप्त हुआ है, वह संसार-समुद्र में नहीं डूबता। चित्तरूपी समुद्र में तृष्णारूपी जल और कामना-रूपी लहरें हैं। जिस पुरुष ने शम और सन्तोष से इन्द्रियाँ जीती हैं, वह चित्तरूप समुद्र में गोते न खायगा। जिसने इन्द्रियों को जीतकर आत्म-पद पाया है, उसको नानात्व जगत् फिर नहीं भासित होता। जैसे मरुस्थल की निराकार नदी में लहरें उठती हैं, पर जब निकट जाकर भली प्रकार देखिये तो वह लहरों के साथ बहती नहीं दिखती, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है। जब भली प्रकार विचार करके देखिये, तब नानात्व नहीं दिखता, आत्मसत्ता ही किञ्चन करके जगत्रूप होकर भासती है। जैसे जल अपने द्रव स्वभाव से तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मसत्ता चेतनता से जगत्रूप होकर भासती है।
हे राम ! जब आत्मबोध होता है, तब फिर दृश्यभ्रम नहीं भासता। जैसे साकाररूप नदी का भाव निवृत्त होता है तो फिर बहती है और जो निराकार नदी का सद्भाव निवृत्त होता है तब फिर नदी का सद्भाव होता है। निराकार मृगतृष्णा की नदी जब ज्यों की त्यों जानो तब फिर सत् नहीं होती। हे राम ! वास्तव में न कर्म हैं; न इन्द्रियाँ हैं, न कर्त्ता है अर्थात् कुछ उपजा नहीं। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की क्रिया और कर्म दिखते हैं, परन्तु सब आकाशरूप हैं, कुछ बनी नहीं, वैसे ही यह भी जानो। आकाशरूप आत्मा में आकाशरूप जगत् स्थित है। जैसे अवयवी और अवयव में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। और जैसे अवयव अवयवी का रूप है, वैसे ही जगत्
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आत्मा का रूप है। जब आत्मा में स्थित होगी, तब अहं-त्वं आदि शब्दों का अभाव हो जायगा और 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी न रहेंगे। 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी अज्ञानी को समझाने के लिए कहे हैं। जो वृद्ध, ज्ञानवान् हैं, वे इन शब्दों पर हँसते और कहते हैं कि अद्वैतपात्र में इन शब्दों का प्रवेश कहाँ है? जिनको यह अवस्था प्राप्त हुई है, उनको न बन्धन है और न मोक्ष है। हे राम! सुषुप्ति और तुरीयावस्था में कुछ थोड़ा ही भेद है। सुषुप्ति में अज्ञान और जड़ता रहती है और तुरीया-वस्था में अज्ञान और जड़ता नहीं रहना है। वह चैतन्य अनुभव सत्ता-रूप है। स्वप्न में जाग्रत् में भी भेद नहीं है। परन्तु इतना भेद है कि अल्पकाल की अवस्था को स्वप्न और चिरकाल की अवस्था को जाग्रत् कहते हैं।
हे राम! जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति, ये तीनों स्वप्न और सुषुप्ति-रूप हैं। जाग्रत् और स्वप्न ये उभय स्वप्नरूप हैं; सुषुप्ति अज्ञानरूप है; जाग्रत् तुरीयरूप है, और जाग्रत् कोई नहीं। जिसके जागने से फिर भ्रम प्राप्त हो, उसको जाग्रत् कैसे कहिये? उसको तो भ्रममात्र जानिये। जिस जागने से फिर भ्रम को प्राप्त हो, उसका नाम जाग्रत् है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, इन चारों अवस्थाओं में चिन्मात्र घनीभूत हो रहा है। वह चारों को नहीं देखता। ज्ञानवान् प्राण का स्पन्दन रोककर आत्मा की ओर चित्त को लगाते हैं, परस्पर ज्ञानमात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं और ज्ञान की ही कथा-कीर्तन करते और उससे प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत् पुरुष जो निरन्तर प्रीति-पूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्मविषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शान्ति को प्राप्त होते हैं। जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है। जो अज्ञानी हैं, वे रागद्वेष से जलते हैं। जिनको आत्मा का दृढ़ अभ्यास हुआ है, उनको शान्ति और आत्मस्थिति प्राप्त होती है। उन्हें उस स्थित के आगे इन्द्र का राज्य भी सूखे तृण सा-तुच्छ लगता है। सब जगत् उनको आत्मरूप दिखता है। जो अज्ञानी
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है, उनको नाना प्रकार के जगत् दिखते हैं। जैसे सोये हुए पुरुष को स्वप्न की सृष्टि सत्य भासती है, वैसे ही जाग्रत् को स्वप्न की सृष्टि भी अपना रूप जान पड़ती है। ज्ञानवान् को सब आत्मरूप दिखता है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता। जब आत्म-अभ्यास का बल हो और अनात्मा के अभाव का अभ्यास दृढ़ हो, तब जगत् का अभाव हो जाता है और अद्वैतसत्ता का भान होता है।
हे राम ! मैंने तुमको बहुत उपदेश किया है। जब इसका अभ्यास होगा, तब इसका फल ब्रह्मबोध हो प्राप्त होगा। वह बोध अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता। जो एक तृण लुप्त करना होता है तो भी कुछ यत्न करना होता है। यह तो त्रिलोकी लुप्त करनी है। हे राम ! जैसे बड़ा भार जिस पर पड़ता है, उससे वह बड़े ही बल से उठता है, बिना बड़े बल नहीं उठता, वैसे ही जीव पर दृश्यरूपी बड़ा भार पड़ा है, जब आत्मरूपी अभ्यास का बड़ा बल हो, तब वह इसको निवृत्त करे, नहीं तो निवृत्त नहीं होता। यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, इसको बारम्बार विचारो। मैंने तो तुमको बहुत प्रकार से और बहुत बार समझाया है। हे राम ! अज्ञानी को ऐसे बहुत कहने से भी कुछ फल नहीं होता। तुमको जो मैंने उपदेश किया है, वह सब शास्त्रों और वेदों का सिद्धान्त है। जिस प्रकार वेद का पाठ करते हैं, उसी प्रकार इसका पाठ कीजिये और विचारिये, इसके रहस्य को हृदय में धारण करिए। तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और अन्य शास्त्र भी इसके अवलोकन से सुगम हो जावेंगे। यदि नित्य इस शास्त्र को श्रद्धासहित सुने और कहे तो अज्ञानी जीव को भी अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। जो एक बार सुनकर कहने लगा है कि एक बार तो सुना है कि फिर क्या सुनना है, उसकी भ्रान्ति निवृत्त न होगी। जो बारम्बार सुने-विचारे और कहे तो उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। सब शास्त्रों से उत्तम युक्ति की संहिता मैंने कही है जो शीघ्र ही मन में बैठ जाती है। जो पुरुष मेरे शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, उनको बोध होता है और दूसरे शास्त्रों का अर्थ भी भली भाँति खुल जाता है। जैसे
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नमक का अधिकारी व्यञ्जन है। उसमें डाला गया नमक स्वादिष्ट होता है और प्रीति सहित ग्रहण किया जाता है, वैसे ही जो इस शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, वे और शास्त्रों का भी सुन्दर अर्थ करेंगे।
हे राम ! किसी और पक्ष को मानकर इसे सुनना त्यागा न चाहिए। जैसे किसी के पिता का खारी कुआँ था और उसके निकट एक मीठे जल का भी कुआँ था, पर वह अपने पिता का कूप मानकर खारी ही जल पीता था और निकट के मीठे जल के कुएँ का त्याग करता था, वैसे ही अपने पक्ष को मानकर मेरे शास्त्र का त्याग न करना। जो ऐसे जानकर मेरे शास्त्र को न सुनेगा, उसको ज्ञान न प्राप्त होगा। जो पुरुष इस शास्त्र में दोष का आरोपण करेगा कि यह सिद्धान्त यथार्थ नहीं कहा, उसको कभी ज्ञान न प्राप्त होगा—वह आत्महन्ता है, उसके वाक्य न सुनना। जो प्रीतिपूर्वक पूज्य भाव करके श्रद्धा से सुनेगा और विचार कर पाठ करेगा, उसको निर्मल ज्ञान प्राप्त होगा और उसके कर्म भी निर्मल होंगे। इससे यह नित्यप्रति विचारने योग्य है। हे राम ! तुमको मैंने अपने किसी स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं किया, केवल दया करके किया है। तुम जो किसी से कहना तो स्वार्थ के बिना दया करके कहना।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रिययज्ञवर्णनं नाम द्विशताधिकसप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा में जगत् कुछ हुआ नहीं। जब शुद्ध चिन्मात्र में अहँ जगता है, तब वही संवेदन जगना जगद्रूप भासित होता है। और जब वह अधिष्ठान की ओर देखता है, तब वही संवेदन अधिष्ठानरूप हो जाता है, अपने रूप को त्यागकर अचेत चिन्मात्र होता है। हे राम ! स्फुरण और अस्फुरण, दोनों में वही है। परन्तु फुरने से जगत् भासता है। वह जगत् भी कुछ और वस्तु नहीं वही रूप है। जब संवित् संवेदन फुरने से रहित होती है, तब चिन्मात्र-रूप हो जाती है। इस कारण ज्ञानवान् को जगत् आत्मरूप भासता है, ब्रह्म से भिन्न नहीं दिखता। जैसे किसी पुरुष का मन और जगह गया
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७६३
होता है तो उसके आगे शब्द होने पर भी वह उसे नहीं सुनाई देता, वह कहता है कि मैंने देखा या सुना कुछ नहीं, क्योंकि जिस ओर चित्त होता है, उसी का अनुभव होता है वैसे ही जिनका मन आत्मा की ओर लगता है, उनको सब आत्मा ही दिखता है—आत्मा से भिन्न जगत् नहीं प्रतीत होता। पर जिसको आत्मसत्ता का प्रमाद है और जगत् की ओर चित्त है, उसको जगत् ही दिखता है। हे राम! ज्ञानवान् के निश्चय में ब्रह्म ही है और अज्ञानी के निश्चय में जगत्। तब ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय एक कैसे हो? जो मनुष्य स्वप्न देख रहा है, उसे स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत् को वह जगत् नहीं दिखता। तब उनका एक ही निश्चय कैसे हो? जगत् के आदि और अन्त दोनों में ब्रह्मसत्ता है और मध्य में भी उसे ही जानो—आत्मसत्ता ही चेतनता से जगतरूप होकर दिखती है। जैसे स्वप्न की सृष्टि के आदि में भी ब्रह्मसत्ता होती है; अन्त में भी ब्रह्मसत्ता होती है और मध्य में जो भासित होता है, वह भी वही है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही यह जगत् आदि, अन्त और मध्य में भी आत्मा से भिन्न नहीं।
ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय है कि जगत् कुछ उपजा नहीं और न उपजेगा, केवल आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और सब ब्रह्म ही है। अहं-त्वं आदि अज्ञान से भासित होता है। जैसे स्वप्न में अहं-त्वं आदि का अनुभव होता है तो अहं-त्वं आदि भी कुछ नहीं, सब अनुभव-रूप है, वैसे ही यह सब जगत् अनुभवरूप है। हे राम! जैसे एक ही रस फूल, फल, टहनी और वृक्ष होकर दिखता है, रस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही नानात्वरूप जगत् दिखता है परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं है, जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर अपने-अपने अनुभव से भिन्न नहीं परन्तु स्वरूप के विस्मरण से आकाररूप दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् का आकार जो दिखता है, वह ज्ञानरूप से भिन्न नहीं है। सब जगत् आत्मरूप है, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न लगता है। यह सब जगत् अपना आप रूप है। जब आत्मरूप है तब ग्राह्य-ग्राहकभाव कैसे हो? यह मिथ्या भ्रम है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, घट, पट आदिक
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सब जगत् ब्रह्मरूप है। ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय रहता है कि अचेत चिन्मात्र अपने रूप में स्थित है। ब्रह्मादिक भी कुछ स्फुरित होकर उदय नहीं हुए, ज्यों के त्यों हैं। उत्थान कुछ नहीं हुआ। परन्तु अज्ञानी के निश्चय में नाना प्रकार का जगत् और उत्पत्ति, स्थित, प्रलय, ब्रह्मादिक सब हैं। हे राम! यह कुछ उपजा नहीं, कारणत्व के अभाव से सदा एकरस आत्मसत्ता ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकाष्टचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब जाग्रत् और स्वप्न का निर्णय सुनो। जब मनुष्य सो जाता है, तब स्वप्न की सृष्टि देखता है। वह जाग्रतरूप भासित होती है। और जब स्वप्न निवृत्त होता है, तब फिर यह सृष्टि देखता है तो यही जाग्रत् होकर भासित होती है। यहाँ सोकर स्वप्न में जाग्रत् होती है और वहाँ सोकर यहाँ जाग्रत् होती है। तो स्वप्न जाग्रत् हुआ। जाग्रत् जो वस्तु है वह आत्मसत्ता है। उसमें जागना वही जाग्रत् में जाग्रत् है, और सब स्वप्न-जाग्रत् है। जब मनुष्य यहाँ शयन करता है, तब स्वप्न का जगत् सत्य होकर दिखता है और यह असत्य हो जाता है, और स्वप्न में वहाँ शयन करता है, अर्थात् जब स्वप्न से निवृत्त होता है और जाग्रत् में जागता है, तब वह असत्य हो जाता है, और वह स्वप्न जाग्रत् में स्मरण हो आता है। जब जाग्रत् में सोया और स्वप्न में जागा, तब जाग्रत् स्वप्नभाव को प्राप्त हुई, और जब स्वप्न से उठकर जाग्रत् में आया तब स्वप्नरूप जाग्रत् स्मृति भाव को प्राप्त हुई। जब सब जाग्रत् हुई तो हे राम! स्वप्न तो कोई न हुआ। इसको सब जगह जाग्रत् हुई। और जाग्रत् तो कोई न हुई, क्योंकि जब जाग्रत् से स्वप्न में गया, तब स्वप्न जाग्रतरूप हो गया और जाग्रत् स्वप्न हो गई, और जब स्वप्न से जाग्रत् में आया, तब जाग्रत् जाग्रतरूप हो गई और स्वप्न जाग्रत्-स्वरूप हो गई। तो हुआ यह कि जाग्रत् कोई नहीं, सब स्वप्न और असत्यरूप है।
अपने काल में यह जाग्रत् है और स्वप्नरूप है। जब प्राणी यहाँ से
❀ निर्वाण प्रकरण ❀ ७४५
मृतक होता है, तब यह जगत् स्वप्नरूप होता है, स्वप्नरूप परलोक जाग्रत् हो जाता है और जाग्रत् स्मृति प्रत्यक्ष हो जाती है तो उसमें वह नहीं रहता और उसमें वह नहीं रहता। और जाग्रत्, स्वप्न, दोनों में परलोक नहीं रहता। इस जाग्रत् में देखिये तो स्वप्न और परलोक दोनों नहीं दिखते और स्वप्न में इस जाग्रत् और परलोक दोनों का अभाव हो जाता है। तो यह सिद्ध हुआ कि सब स्वप्नमात्र है। हे राम! चिरकाल की प्रतीति को जाग्रत् और अल्पकाल की प्रतीति को स्वप्न कहते हैं। जो आदि स्वप्न हुआ और उसमें दृढ़ अभ्यास हो गया, इससे जाग्रत् होकर भासित होती है; इसलिए जो आकार तुमको सत्य लगते हैं, वे सब निराकार आकाशरूप हैं, कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्न में त्रिलोकी-जगत्भ्रम उदय होता है, परन्तु सब आकाशरूप होता है, वैसे ही ये जगत् के पदार्थ अविद्या से साकार दिखते हैं। ये सब निराकार और आकाशरूप हैं। जब आत्मतत्त्व अधिष्ठान में जागोगे, तब सभी आकाशरूप दिखेंगे। अद्वैत आत्मतत्त्व में जो ग्राह्य-ग्राहकभाव दिखता है, सो मिथ्या कल्पना है, वास्तव में कुछ नहीं। सब जगत् मृगतृष्णा के जलसरीखा मिथ्या है। उसमें ग्रहण और त्याग क्या कीजिये? इन दोनों की कल्पना को दूर करो। यह हो और यह न हो, इस कल्पना को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो रहो, तब सम्पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकोनपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ २४९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! इन अर्थों का जो आश्रयभूत है, वह मैं तुमसे कहता हूँ। इस जगत् के आदि में अद्वैत चिन्मात्र था, उसमें किसी शब्द की प्रवृत्ति न थी—अशब्द पद था। फिर उसमें जागना जगा और उसका आभास जगत् हुआ। उस आभास में जिनका अधिष्ठान की अहंप्रतीति है, उनको जगत् आकाशरूप दिखता है, और वह संसार में नहीं डूबता, क्योंकि उसके अज्ञान का अभाव है। जो डूबता नहीं, वह निकलता भी नहीं; उसके लिए अज्ञान की निवृत्ति
७६६ योगवाशिष्ठ
और ज्ञान का भी अभाव है, क्योंकि वह स्वतः ज्ञानस्वरूप है। जिनको अधिष्ठान का प्रमाद हुआ है, उनको दोनों अवस्थाएँ होती हैं। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् आत्मरूप दिखता है और जो ज्ञान से रहित है, उसको भिन्न भिन्न नामरूपवाला जगत् भासित होता है। हे राम! आत्मा निराख्यात है। वह चारों आख्यातों से रहित निराभाससत्ता है। चारों आख्यात उसमें आभास हैं। एक आख्यात, दूसरा विपर्य-याख्यात, तीसरा असत्याख्यात और चौथा आत्माख्यात, ये चार आख्यात हैं। आख्यात ज्ञान को कहते हैं। यह ज्ञान 'कि मैं अपने को नहीं जानता,' आख्यात है। अपने को देह-इन्द्रियरूप जानने का नाम विपर्ययाख्यात है। जगत् असत्य जानने का नाम असत्याख्यात है और आत्मा को आत्मा जानने का नाम आत्माख्यात है। ये चारों आख्यात चिन्मात्र आत्मतत्त्व के आभास हैं। आत्मसत्ता निर्विकल्प अचेत चिन्मात्र है। उसमें वाणी की गति ही नहीं है। हे राम! जगत् भी वही स्वरूप है, और कुछ बना नहीं। वह तत्त्व घनशिला की नाईं अविन्त्य स्वरूप है।
इस पर एक आख्यान है, जो श्रवणों का भूषण है, इसलिए तुमसे कहता हूँ। वह द्वैतदृष्टि का नाशकर, ज्ञानरूपी कमल का विकास करनेवाला सूर्य और परमपावन है। उसे सुनो। हे राम! एक बड़ी शिला है, जिसका कोटि योजन तक विस्तार है। वह अनन्त है, किसी ओर उसका अन्त नहीं आता, वह शुद्ध, निर्मल और निरासाध है, अर्थात् अणु-अणु से पुष्ट नहीं हुई, अपनी सत्ता से पूर्ण और परम सुन्दर है। जैसे शालग्राम की प्रतिमा सुन्दर होती है, वैसे ही वह सुन्दर है। जैसे शालग्राम पर शंख, चक्र, गदा और पद्म की रेखा होती हैं, वैसे ही उस पर रेखा है, और वही रूप है। वह वज्र से भी कठिन, शिला की नाईं निर्विकार और निराकार अचेतन परमार्थ है। यह जो कुछ चेतनता भासित होती है, वही उस पर रेखा है। अनन्त कल्प बीत गये हैं, परन्तु उसका नाश नहीं होता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये सब भी उस पर रेखा हैं। वह आप पृथ्वी आदि भूतों से
७६८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह शिला परमात्मा है। मैंने उसे शिलारूप इसलिए कहा कि यह घन चैतन्यरूप है, उससे इतर कुछ नहीं। वह अचिन्त्यरूप है। उस पर पञ्चतत्त्व रेखा है। वे रेखा भी वही रूप हैं। एक रेखा बड़ी है, जिसमें और रेखा रहती हैं। वह बड़ी रेखा आकाश है, जिसमें और तत्त्व रहते हैं। सब पदार्थ आकाश में हैं, सो सब वही रूप है। तुम भी वही रूप हो और मैं भी वही रूप हूँ। और कुछ हुआ नहीं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सब पदार्थ और कर्म जो भासित होते हैं, वे सब ब्रह्मरूपी शिला की रेखा है और कुछ हुआ नहीं। सब काल में ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। नाना प्रकार के व्यवहार भी देखे जाते हैं, परन्तु वही रूप हैं, और कुछ है ही नहीं। वैसे ही वह जानो। घट, पट, पहाड़ कन्दरा, स्थावर, जङ्गम, जगत् सब आत्मरूप है। आत्मा ही फुरने से ऐसे दिखता है। जैसे जल की लहरें होकर दिखता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है। और सब पदार्थ पवित्र, अपवित्र, सत्य, असत्य, विद्या, अविद्या, सब आत्मसत्ता ही के नाम हैं, इतर वस्तु कुछ नहीं है। ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम ! सभी वज्र ब्रह्मरूप है और चिन्मात्र घन ही सबमें व्याप रही है। पर परमार्थसत्ता घन शान्तरूप है और ये सब परमार्थ भी घनरूप हैं, इसलिए संकल्प-रूपी कल्पना को त्यागकर उसमें स्थित हो रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो पुरुष स्वभावसत्ता में स्थित हुए हैं, उनको ये चारों आख्यात कहे हैं। जितने और शब्दार्थ हैं, वे शशा के सींग की तरह असत्य हैं। जगत् का निश्चय उनमें नहीं रहता और सब ब्रह्माण्ड उनको आकाश सा दिखता है। आख्यात की कल्पना भी उन्हें कुछ नहीं फुरती। और सब जगत् जो दीखता है, वह निराकार परम चिदाकाशरूप है, परम निर्वाणसत्ता से युक्त दिखता है और उसी से निर्वाण हो जाता है, इसलिए वही स्वरूप है। हे राम ! जब इस प्रकार जानकर तुम उस पद में स्थित होगे, तब बड़ा शब्द करते हुए
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६६
भी तुम निश्चय से पाषाण-शिलासदृश मौन रहोगे और देखोगे, खाओगे, पियोगे, सूँघोगे, परन्तु तुम्हारे अपने निश्चय में कुछ न फुरेगा। जैसे पाषाण की शिला फुरना नहीं फुरता, वैसे ही तुम रहोगे-जो पैरों से दौड़ते जाओगे तो भी निश्चय ही चलायमान न होगे। जैसे आकाश और सुमेरु पर्वत अचल है, वैसे ही तुम भी स्थित रहोगे। क्रिया तो सब करोगे, परन्तु हृदय में क्रिया का अभिमान तुमको कुछ न होगा, केवल स्वभावसत्ता में स्थित होंगे। जैसे मूढ़ बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, सो वह अविचारसिद्धि है और विचार किये से कुछ नहीं रहता, वैसे ही मूर्ख अज्ञानी आत्मा में मिथ्या आकार की कल्पना करते हैं। विचार करने से सब आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। जैसे मरुस्थल में नदी तब तक दिखती है, जबतक विचार करके नहीं देखता और विचार करने से नदी नहीं रहती वैसे ही यह जगत् विचार करने से नहीं रहता। जगत् चैतन्यरूपी रत्न की चमक है। चैतन्य आत्मा का किञ्चन फुरने से ही जगतरूप भासित होता है।
रामजी बोले, हे भगवन्! इस जगत् का कारण मैं स्मृति को मानता हूँ। वह स्मृति अनुभव से होती है और स्मृति से अनुभव होता है। स्मृति और अनुभव परस्पर कारण हैं। जब अनुभव होता है, तब उसको स्मृति भी होती है। तो वह स्मृतिसंस्कार फिर स्वप्न में जगतरूप हो क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् किसी संस्कार से नहीं उपजा और किसी अनुभव का संस्कार नहीं है। काकतालीय न्याय से अकस्मात् प्रकट हुआ है। हे राम! यह जगत् आभासमात्र है। आभास का अभाव कभी नहीं होता, क्योंकि वह उसका चमत्कार है। इतर कुछ बना हो तो उसका नाश भी हो, पर आत्मा से भिन्न तो कुछ हुआ ही नहीं, नाश कैसे और किसका हो? यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। आत्मसत्ता अपने स्वभाव में स्थित है और जगत् उसका आभास है। हे राम! तुम जो स्मृति को कारण कहते हो, सो कारण-कार्यभाव आभास वहाँ भासित होते हैं, जहाँ द्वैत है। स्वरूप में तो कुछ कारण-कार्य भाव नहीं है। जैसे स्वप्न के मरुस्थल में
८०० ✽ योगवाशिष्ठ ✽
जल भासित हुआ तो उसमें जल माना गया। इसलिए जागकर जब देखा तो उस जल की स्मृति हुई अथवा स्वप्न के व्यवहारकर्ता को स्वप्नान्तर हुआ और उसे स्वप्नान्तर में फिर व्यवहार किया।
हे राम ! तुम देखो कि उसकी स्मृति भी असत्य हुई और जो उसने अनुभव किया वह भी असत्य है। वैसे ही यह संसार भी है, कुछ भिन्न नहीं। हे राम ! इसलिए न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न कोई सुषुप्ति है और न तुरीयावस्था है। केवल अद्वैतसत्ता सब उत्थान से रहित चिन्मात्र स्थित है। इसलिए जगत् भी वही रूप है। और यद्यपि क्रिया भी दिखती है तो भी कुछ हुआ नहीं। जैसे स्वप्न में कोई नारी आकर गले से लगती है तो उसकी क्रिया कुछ सच नहीं होती, वैसे ही यह क्रिया भी सच नहीं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय शब्दों का अर्थ निश्चय ज्ञानवान् पुरुष को है और ये उसको खरगोश के सींग और आकाश के फल सो असत्य प्रतीति होती हैं। जैसे बन्ध्या का पुत्र और श्याम चन्द्रमा शब्द कहने भर को हैं, इनका अर्थ असत्य है, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में पाँचों अवस्थाओं का होना असंभव है। वह सर्वदा जाग्रत है। जाग्रत् उसका नाम है, जहाँ अनुभव हो। वह अनुभवसत्ता सदा जाग्रत् रूप है। जैसा पदार्थ आगे आता है, उसी का जीव अनुभव करता है इससे सर्वदा सब कालों में, जाग्रत् है। अथवा सर्वदा स्वप्न है। स्वप्न उसका नाम है, जहाँ पदार्थ विपर्यय (उलटे) दिखते हैं। सो सब पदार्थ विपर्यय ही दिखते हैं। विपर्यय से रहित एक आत्मा है। उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, सो विपर्यय है, इसलिए सब काल में स्वप्न ही है। अथवा सर्वदा सुषुप्ति ही है। सुषुप्ति उसका नाम है, जहाँ अज्ञानवृत्ति हो। मैं अपने वास्तव रूप को भी नहीं जानता इसलिए न जानने सर्वदा सुषुप्ति। अथवा सर्वदा तुरीयावस्था है। तुरीयावस्था उसका नाम है जो साक्षीभूत सत्ता हो, जिसमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था का अनुभव होता है। जो सर्वदा सबको अनुभव करता है, वह प्रत्येक चैतन्य है। इससे सर्वदा तुरीयपद है। अथवा सर्वदा तुरीयातीतपद है। तुरीयातीत उसको कहते हैं, जो
✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ८०१
अद्वैत सत्ता है, जिसके पास द्वैत कुछ नहीं। सो सर्वदा अद्वैतसत्ता है। उसमें जगत् का अत्यन्त अभाव है, जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है—इसलिए सर्वदा तुरीयातीतपद है। जो मुझसे पूछो तो मुझको तरङ्ग, बुलबुले झाग और भँवर कुछ नहीं भासित होते—सर्वदा चित्-समुद्र ही दिखता है। उदय-अस्त से रहित आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और पृथ्वी आदि तत्त्व जो दिखते हैं, वे भी कुछ उपजे नहीं, आत्मसत्ता का किञ्चन ही इस प्रकार भासित होता है।
जैसे नख और केश उपजते भी हैं और नाश भी हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् उपजता भी है और लीन भी हो जाता है। जैसे नख और केश के उपजने और काटने से शरीर ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् के उपजने और लीन होने में आत्मा ज्यों का त्यों रहता है। हे राम ! यह जगत् उपजा नहीं तो उसमें सत्य और असत्य कल्पना और स्मृति क्या कहिये और भीतर और बाहर क्या कहिये ? अद्वैतसत्ता में कुछ कल्पना नहीं बनती। जो तुम कहो कि स्मृति भीतर होती है, परन्तु भीतर से बाहर दिखती है, तो भीतर अनुभव की अपेक्षा से हुई है, वह भी उत्पन्न नहीं हुई। तब मैं भीतर और बाहर क्या कहूँ ? जैसे स्वप्न-सृष्टि भासित होती है सो वह अपना ही अनुभव होता है, और वही सृष्टिरूप दिखता है। वहाँ तो भीतर-बाहर कुछ नहीं है। वैसे ही यह जगत् भीतर-बाहर कुछ नहीं है, सब भ्रमरूप है। जिसको इच्छा कहते हैं, उसे ही स्मृति कहते हैं। विद्या-अविद्या, इष्ट-अनिष्ट आदि सब शब्द सब आत्मा के ही नाम हैं—आत्मा से भिन्न और पदार्थ कुछ नहीं है। हे राम ! जागकर देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। मिथ्या भ्रम को अंगीकार करके भिन्न क्यों देखते हो ? सब शब्द बिना अर्थ के कहीं नहीं हैं और शब्द-अर्थ का विचार संकल्प से होता है। संकल्प तब उठता है जब चित्त में अहंअभिमान होता है। उस चित्त को आत्मासार में लीन करो। जब चित्त का निर्वाण करोगे तब सब जगत् शान्त हो जायगा। अहं के दर्पण में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं। जब चित्त निर्वाण हो जायगा, तब सब
८०२ ✵ योगवाशिष्ठ ✵
द्वैतकल्पना मिट जायगी । यह जो मोक्षशास्त्र मैंने तुमसे कहा है, इसके अर्थ कर विचारकर संकल्प को त्यागकर, अपने परमानन्दस्वरूप में स्थित हो रहो।
इतिश्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५१॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत् किसी कारण से नहीं उत्पन्न हुआ। जैसे समुद्र में तरंग स्वाभाविक उठते हैं, वैसे ही संवित्सत्ता से आदि-सृष्टि जगी है। और जैसे जल स्वाभाविक द्रवता से तरङ्गरूप अपनी सत्ता से बढ़ता जाता है, वैसे ही आत्मसत्ता से जगत् का विस्तार होता है । यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जब चिन्मात्र आत्मसत्ता का आभास बहिर्मुख जगता है, तब अन्तःकरण चतुष्टय होते हैं। उनमें जो निश्चय होता है, उसका नाम नीति है। वह प्रथम अकस्मात् कारण के बिना स्वाभाविक ही जग आया है और आभासमात्र है। जब वह दृढ हो गया, तब नीति स्थित हुई । वास्तव में द्वैत कुछ बना नहीं। जो सम्यक्दर्शी पुरुष हैं, उनको सब आत्मा ही दिखता है—जैसे पत्ते, फूल, फल टहनी सब वृक्ष हैं, उससे भिन्न नहीं हैं। हे राम ! वृक्ष में जो फूल, फल, और टहनी होती हैं, सो किसी कारण से बुद्धिपूर्वक बनी नहीं होतीं ? वैसे ही इस जगत् को भी जानो। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न रूप भी पत्ते, टास आदि के विस्तार में एक वृक्ष ही दिखता है। वैसे ही यथार्थ ज्ञानी को सब आत्मा ही दिखता है, और मिथ्यादृष्टिवाले को भिन्न-भिन्न पदार्थ दिखते हैं। हे राम ! वृक्ष को देखनेवाला भी और होता है, और दृष्टान्त में दूसरा कोई नहीं। चैतन्य आत्मा का आभास ही चेत्य है, वही चैतन्यरूप होकर भासित होता है । उस चैतन्य आभास को असम्यक् दृष्टि से भिन्न-भिन्न पदार्थ दीखते हैं। जैसे पत्ते, फूल, फल और वृक्ष अपने को भिन्न जानें। और सम्यक्दर्शी सबको आत्मरूप देखता है। ज्ञानी और अज्ञानी सब आत्मरूप हैं—जैसे दीवार पर लिखी पुतलियाँ दीवार से भिन्न नहीं होतीं, वैसे ही सर्वगत आत्म-रूपी दीवार के सब दृश्य चित्र हैं। वे आत्मा से भिन्न नहीं हैं। जैसे
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८०३
आकाश में शून्यता, फूलों में सुगन्ध, जल में द्रवता, वायु में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । हे राम ! जगत् आत्मा का आभास है, इसलिए वही रूप है । यह जगत् भी अचेत्य चिन्मात्र है ।
जो तुम कहो कि अचेत्य चिन्मात्र है तो पृथ्वी, पहाड़ आदि आकर क्यों दिखते हैं ? तो हे राम ! जैसे नित्यप्रति जो तुमको स्वप्न आता है और उस अनुभव आकाश में पृथ्वी आदिक तत्त्व दिखते हैं तो वही चिन्मात्र ही आकार होकर दिखता है, और कुछ नहीं । वैसे ही इसे भी जानो । यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह अनुभवरूप है । जैसे चिन्मात्र आत्मा में सृष्टि आभासमात्र है, वैसे ही कारण-कार्य-भाव भी आभास-मात्र है । परन्तु वही रूप है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । ये पदार्थ कार्य-कारण-अभ्यास की दृढ़ता से उपजे लगते हैं, पर आदि-सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजी—पीछे कारण से कार्य हुए । यद्यपि कार्य-कारण दिखते हैं तो भी कुछ उपजे नहीं, सदा अद्वैतरूप है । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के कार्य-कारण दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं, सदा अद्वैतरूप हैं, वैसे ही जाग्रत् में भी जानो । पदार्थों की स्मृति भी स्वप्न में होती है और अनुभव भी स्वप्न में होता है । जब स्वप्न ही नहीं हुआ तो स्मृति कहाँ है और अनुभव कहाँ है ? न जगत् का अनुभव है न जगत् है । अनुभवसत्ता ही जगत्रूप होकर दिखती है, जो जाग्रतरूप है । जब उसका अनुभव होगा, तब न स्मृति रहेगी और न जगत् रहेगा । इसलिए हे राम ! जो अनुभवरूप है, उसका अनुभव करो । यह जगत् अरूप है । जो उपजा नहीं, वह स्वतः सिद्ध है, और जो उपजा है और जिसमें दिखता है, उसे उसी का रूप जानो, भिन्न कुछ नहीं है । जैसे स्वप्न में जो पदार्थ दिखते हैं, वे उपजे नहीं, परन्तु उपजे दिखते हैं, सो वे अनुभव में उपजे हैं । अनुभव स्वतः सिद्ध है । उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, वे अनुभव-रूप हैं और अनुभवरूप ही इस प्रकार होकर दिखता है । वैसे ही ये सब अनुभवरूप हैं—भिन्न कुछ नहीं ।
८०४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
यह सब जगत् आत्मरूप है; इसलिए हे रामजी! सब जगत् अकारण और आत्मा का आभास है—कारण से कुछ नहीं बना। अनन्त ब्रह्मसत्ता ब्रह्माण्ड में आभास जगते हैं। वे अज्ञानी को कार्य-कारण सहित प्रतीत होते हैं। उसमें नीति हुई है, पर जब जागकर देखोगे, तब सब अद्वैतरूप दिखेगा। न कोई नीति है और न जगत् है। जब तक जीव अज्ञान-निद्रा में सोया हुआ है, तब तक जो पदार्थ उस सृष्टि में है, वही दिखेगा और जैसा कर्म है, वही भासित होगा। यह जगत् एक स्वप्न है, जिसमें स्वर्गादिक इष्ट पदार्थ और नरकादिक अनिष्ट पदार्थ हैं, और उनके प्राप्त होने का साधन धर्म तथा अधर्म है। धर्म स्वर्ग-सुख का और अधर्म नरकदुःख का साधन है। जब तक अविद्यारूपी निद्रा में जीव सोया हुआ है, तब तक इनको यथार्थ जानता है, पर जब जागेगा, तब सब आत्मरूप होगा। इष्ट-अनिष्ट कोई न रहेगा। यह सब जगत् अनुभवरूप है, और अनुभव सदा जाग्रत् ज्योति है। उसी को जानो। जिन पुरुषों ने इस अनुभव को नहीं जाना, वे उन्मत्त पशु हैं, क्योंकि वे आत्मबोध से शून्य हैं। वे सदा समीपवर्ती आत्मा को नहीं जानते, इससे उन्मत्त हैं, क्योंकि उन्मत्त को भी अपना आपा भूल जाता है। जैसे किसी को पिशाच लगता है, तब उसको अपना स्वरूप भूल जाता है और पिशाच ही देह में बोलता है, वैसे ही जिसको अज्ञानरूपी भूत लगता है, वह उन्मत्त हो जाता है, आत्मस्वरूप को नहीं जानता। वह विपर्यय बुद्धि से देहादिक को आत्मा जानता है और विपर्यय शब्द करता है। जिनको स्वरूप में अहंप्रतीति है, उनको सब जगत् आत्मरूप दिखता है। हे राम! आदिसृष्टि किसी कारण से बनी होती तो उसके पीछे प्रलयादिक में कुछ शेष रहता, पर वह अत्यन्त अभाव होती है, इसलिए सब जगत् कारण है। जैसे चिन्तामणि से अकारण पदार्थ दिखता है, वैसे ही यह अकारण है। न कहीं संस्कार है और न स्मृति है, सब आत्मा के पर्याय हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इससे सब जगत् को आत्मरूप जानो।
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो संस्कार से अनुभव न होता और
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ८०५
अनुभव से स्मृति न होती तो इस प्रकार प्रसिद्ध क्यों दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारा यह संशय भी दूर करता हूँ । जैसे हाथी के बालक को मारने में सिंह को कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही इस संशय का नाश करने में मुझे कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । जैसे सूर्य के उदय हुए तिमिर का अभाव हो जाता है, वैसे ही मेरे वचनों से तुम्हारा संशय दूर हो जायगा । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्रस्वरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु पुतलियाँ कुछ बनी नहीं, उसके मन में पुतलियों का आकार है, वैसे ही आत्मरूपी खम्भे में चित्तरूपी शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है ।
हे राम ! खम्भे में पुतलियाँ निकालते हैं तभी निकलती हैं, परन्तु आत्मा तो अद्वैत और निराकार है, उसमें और कुछ नहीं निकलता । उसमें वाणी की भी गति नहीं । वह चैतन्यमात्र है । अहं के फुरने से वह अपने को चैतन्य जानता है और फिर आगे शब्दों के अर्थ की कल्पना करता है । अपने को शुद्ध अधिष्ठान चैतन्य जानना ही ज्ञान है । ईश्वर, जीव, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, -आकाश, देश, काल इत्यादि शब्द और अर्थ स्फुरण ही में हुए हैं-जैसे एक ही समुद्र में द्रवता से आवर्त, तरङ्ग, फेन और बुलबुले आदि नाम होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्म ही के नाम हैं, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । वह फुरने से जगत् आकार होकर भासता है और फुरने से रहित होने पर जगत् आकार मिट जाता है । परन्तु फुरने न फुरने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे स्पंदन और निस्पंद में वायु ज्यों की त्यों है और सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे ब्रह्मस्वरूप हैं । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव पहाड़, वृक्ष आदि नाना प्रकार का जगत् होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जाग्रत् जगतरूप होकर दिखती है । वही कहीं अन्तवाहक, कहीं आधिभौतिक, कहीं ईश्वर और कहीं जीव आदि होकर भासित होता है, इससे लेकर शब्द-अर्थसंयुक्त जो जीव प्रकट होता गया है, वह ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित हुई है । जैसे खम्भे में पुतलियाँ खम्भरूप होती है, वैसे ही आत्माकाश में
८०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे उसमें जगत् आभास है, वैसे ही स्मृति-अनुभव भी आभास है । स्मृति जो संस्कार है उससे जगत् की उत्पत्ति तब कहिये, जब स्मृति आभास न हो । स्मृति-संस्कार भी तो आभास है, फिर वह जगत् का कारण कैसे हो सकती है ? स्मृति भी तब होती है, जब प्रथम जगत् होता है । जब जगत् ही नहीं तो स्मृति कैसे हो ? इससे जगत् आभासमात्र है । इसका कारण कोई नहीं ।
हे राम ! स्मृति-संस्कार जगत् का कारण तब हो, जब कुछ जगत् आगे हुआ हो । सो तो कुछ हुआ नहीं । और अनुभव उसका होता है, जो पदार्थ भासित होता है । सो इस जगत् के आदि में कुछ जगत् का अंश न था, फिर अनुभव कैसे कहूँ ? जो अनुभव ही न हुआ तो स्मृति किसको हो और जब स्मृति ही न हुई तो फिर उससे जगत् कैसे कहूँ ? इसलिए हे राम ! आदि-जगत् अकारण अकस्मात् उपजा है । जैसे रत्न की चमक होती है, वैसे ही जगत् है । यह पीछे से कारण-कार्य रूप भासित होता है । इससे हे राम ! जिसका कारण कोई न हो, उसे जानिये कि उपजा नहीं । वह जिसमें दिखता है, वही रूप है । अधिष्ठान से भिन्न कुछ नहीं । सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । स्मृति भी भ्रम में आभास जगा है और अनुभव भी आभास है । सो ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । और आभास भी कुछ उपजा नहीं, आभास की नाईं जगत् दिखता है—आत्म-सत्ता अद्वैत है, जिसमें आभास, स्मृति, अनुभव, जाग्रत् और स्वप्न की कल्पना कुछ नहीं तो क्या है ? ब्रह्म ही है । फुरना जिसे कहते हैं, वह कुछ वस्तु नहीं है । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही स्पन्दन चैतन्य आत्मा में जगत् की कल्पना करता है । शिल्पी तो आप भिन्न होकर कल्पना करता है, और यह चित्तसत्ता ऐसी है कि अपने ही स्वरूप में कल्पना करती है और जगतरूपी पुतलियाँ देखती है । आत्मा आकाशरूपी खंभा है, उसमें जगत् भी आकाशरूपी पुतलियाँ हैं । जैसे आकाश अपने आकाशभाव में स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने ब्रह्मभाव में स्थित है । जगत् भिन्न भी दिखता है परन्तु
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८०७
अचैत्य चिन्मात्रस्वरूप है, भेदभाव को नहीं प्राप्त हुआ। और विकार- वान् भी दिखता है, परन्तु विकार नहीं हुआ। जैसे स्वप्न में जीव आप ही सब स्पष्ट दिखाते हैं, वैसे ही यह जगत् अपने आपमें दिखता है, परन्तु कुछ नहीं है। हे राम! यही आश्चर्य है कि मैंने अपने अनु- भव को प्रकट करके उपदेश किया है; जीव आप भी जानते हैं, स्वप्न में नित्य देखते हैं और सुनते भी हैं, परन्तु निश्चय करके जान नहीं सकते और स्वप्न के पदार्थों को मूर्खता से त्याग नहीं सकते।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शालभञ्जनकोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो पुरुष इन्द्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुःख नहीं मानता इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता, उसको जीवन्मुक्त जानो। हे राम! सब शब्द अर्थ जिसका द्वैतरूप नहीं दिखते, उसे तुम जीवन्मुक्त जानो। जिस अविद्यारूपी जाग्रत् में अज्ञानी जागते हैं, उसमें ज्ञानवान् सो रहे हैं और परमार्थरूपी जाग्रत् में अज्ञानी सो रहे हैं। वे नहीं जानते कि परमार्थ क्या है? परन्तु उसमें जीवन्मुक्त स्थित है। इस कारण ज्ञानवान् इष्ट- अनिष्ट विषयों को पाकर सुखी और दुखी नहीं होते। उनका चित्त सदा आत्मपद में स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो पुरुष सुख पाकर सुखी और दुःख से दुःखी नहीं होता, वह तो जड़ हुआ। चैतन्य तो न हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सुख-दुःख तब तक होता है, जबतक चित्त को जगत् का सम्बन्ध होता है। जब चित्त जगत् के सम्बन्ध से रहित चिन्मात्र होता है, तब उपाधिकृत सुख-दुःख नहीं रहते। जो अपने स्वभाव में स्थित पुरुष हैं, ये परम विश्राम को प्राप्त होते हैं और सब कुछ करते हैं, परन्तु स्वरूप से उनको कर्तव्य का उत्थान कुछ नहीं होता, और सदा अद्वैत में निश्चय रहता है। नेत्रों से वे देखते हैं, परन्तु द्वैत की भावना उनको नहीं फुरती। जैसे अत्यन्त उत्तम को सब पदार्थ दिखते हैं, परन्तु सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही जिसकी बुद्धि