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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1589, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1589

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ७८५

में रूप, अवलोक और मनस्कार होकर दिखती है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न भासित होते हैं। जो जागा है, उसको अपना रूप भासित होता है। जैसे अपनी चैतन्यता ही स्वप्नपुर होकर दिखती है, वैसे ही जगत् के पूर्व जो चैतन्यसत्ता थी, वही जगत् रूप होकर भासित होती है। जगत् आत्मा से कुछ भिन्न वस्तु नहीं, वही स्वरूप है। जैसे जल का स्वभाव द्रवीभूत होता है, इससे तरंगरूप होकर भासित होता है, वैसे ही आत्मा का स्वभाव चैतन्य है। वही आत्मसत्ता चेतनता से जगत् आकार होकर भासती है। इस प्रकार जानकर परम शान्ति निर्वाणपद में स्थित हो रहो। हे राम ! जगत् कुछ है नहीं, और प्रत्यक्ष भासता है; असत् ही सत् होकर भासित होता है। यही आश्चर्य है कि निष्किञ्चन और किञ्चन की नाईं होकर भासित होता है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत और निर्विकार है, परन्तु अज्ञानदृष्टि से नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं। जब सब विकारों को निषेध से असत् रूप जानिये, तब सबका अभाव होने पर आत्मसत्ता शेष रहती है। जैसे शून्य स्थान में अनहोता वेताल दिखता है, वैसे ही अज्ञानी को अनहोता जगत् आत्मा में भासित होता है। जो पुरुष स्वभाव में स्थित हैं, उनको जगत् भी अद्वैतरूप आत्मा दिखता है। जब सतशास्त्रों और सन्तों की संगति होती है और उनके तात्पर्य अर्थ में दृढ़ अभ्यास होता है, तब स्वभावसत्ता में स्थिति होती है।

जिन पदार्थों को पाने के लिए मनुष्य यत्न करता है, वे मायिक पदार्थ बिजली की चमक के समान उदय होते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। ये पदार्थ विचार बिना सुन्दर दिखते हैं और इनकी इच्छा मूर्ख करते हैं, क्योंकि उनको जगत् सत्य प्रतीत होता है। ज्ञानवान् को जगत् के पदार्थों की तृष्णा नहीं होती, क्योंकि वह जगत् को मृगतृष्णा की नाईं असत्य जानता है और ब्रह्मभावना में दृढ़ है। अज्ञानी को जगत् की भावना है, इससे ज्ञानी के निश्चय को अज्ञानी नहीं जानता। पर अज्ञानी के निश्चय को ज्ञानी जानता है। जैसे सोये हुए पुरुष को निद्रा-दोष से स्वप्न आता है, और उसमें जगत् दिखता है, पर