योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1588, कुल 1734 में से
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जाग्रत् देखता है और अनन्त स्वप्न देखता है । हे राम ! जैसे मृत्युपर्यन्त अनेक स्वप्न आते हैं, वैसे ही मोक्षपर्यन्त अनेक जाग्रतरूप जगत् भासते हैं । तब जीव भ्रमान्तर में इनकी सत्यता और जाग्रत् में स्वप्न के पदार्थ स्मरण करता है । जैसे सिद्ध प्रबुद्ध होकर अपने जन्म को स्मरण करता है और कहता है कि सब भ्रममात्र थे, वैसे ही यह जीव जब जागेगा, तब कहेगा कि सब भ्रममात्र प्रतिभा मुझको भासित हुई थी । न कोई बँधा है और न कोई मुक्त है, क्योंकि दृश्य अविद्याकृत बन्धन-मोक्ष ऐसा है कि जब चित्त की वृत्ति निर्विकल्प होती है, तब मोक्ष भासित होता है और जब तक वासना का विकल्प सत्य है, तब तक बन्धन प्रतीत होता है । हे राम ! आत्मा में बन्धन या मोक्ष दोनों नहीं हैं, क्योंकि बन्धन हो तो मोक्ष भी हो, पर जब बन्धन ही नहीं तो मोक्ष कैसे हो ? बन्धन और मोक्ष दोनों, चित्तसंवेदन में भासते हैं, इससे चित्त को निर्वाण करो, तब सब कल्पना मिट जावेगी । जितने पदार्थों का प्रतिपादन करनेवाले शब्द हैं, उनको त्यागकर निर्मल ज्ञानमात्र जो आत्मसत्ता है, उसमें स्थित हो रहो । खाना, पीना, बोलना, चलना आदि सब कर्म करो, परन्तु हृदय से परमपद पाने का यत्न करो । हे राम ! प्रथम नेति-नेति करके सब शब्दों का अभाव करो । फिर अभाव का भी अभाव करो । तब उसके पीछे जो शेष रहेगा, वह आत्मसत्ता परम निर्वाणरूप है । उसी में स्थित हो रहो । जो कुछ अपना आचार कर्म है, उसे यथाशास्त्र करके हृदय से सब कल्पनाओं का त्याग करो—इस प्रकार आत्मसत्ता में स्थित हो रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणोपदेशो नाम द्विशताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे सब चिदाकाश आत्मरूप हैं । ज्ञानवान् को सदा वही भासित होता है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । रूप, दृश्य, अवलोक, इन्द्रियाँ और मनस्कार के स्फुरण का नाम संसार है । सो यह भी आत्मरूप है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । जैसे अपनी ही संवित् स्वप्न