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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1587, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1587

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८३

ब्रह्मसत्ता तो सदा अपने आप में स्थित है, पर जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही भासता है—सब जगत् उसी का चमत्कार है। जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप होते हैं, वैसे ही निराकार परमात्मा में जगत् भी आकाश-रूप है। भिन्न कुछ नहीं, सब ब्रह्मस्वरूप है। इसका नाम परमबोध है। जब इस बोध की दृढ़ता होती है, तब मोक्ष होता है। जिसको सम्यक्-बोध होता है, उसको सब जगत् ब्रह्मस्वरूप अपना ही रूप भासित होता है। जिसको सम्यग्बोध नहीं हुआ, उसको नाना प्रकार का द्वैतरूप जगत् भासित होता है। हे राम! जिसकी बुद्धि शास्त्रों के अभ्यास से तीक्ष्ण हुई है और वैराग्य के अभ्यास से सम्पन्न और निर्मल है, उसको आत्मपद प्राप्त होता है। जिसकी बुद्धि शास्त्र के अर्थ से निर्मल नहीं हुई, उसको अज्ञान से जगत् भासित होता है। जैसे किसी पुरुष के नेत्र में दोष होता है तो उसको आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं और भ्रम से तारे दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से जगत् भासित होता है। यह सब जाग्रत् जगत् स्वप्नमात्र है। जब जीव स्वप्न में होता है, तब स्वप्न भी जाग्रत् लगता है, जाग्रत् स्वप्न हो जाता है, जाग्रत् में स्वप्न का अभाव हो जाता है और जाग्रत् सत्य प्रतीत होता है। अल्प-काल का नाम स्वप्न है और दीर्घकाल का नाम जाग्रत् है, पर आत्मा में दोनों तुल्य हैं। जैसे जो दो भाई जोड़े जन्मते हैं, वे नाममात्र के दो होते हैं, वास्तव में एकरूप हैं, वैसे ही जाग्रत् स्वप्न-तुल्य ही हैं। जब पुरुष शरीर को त्यागता है, तब परलोक जाग्रत् हो जाता है और यह जगत् स्वप्नवत् हो जाता है। जैसे जीव स्वप्न से जागकर स्वप्न के पदार्थों को भ्रममात्र जानता है और जाग्रत् को सत् जानता है, वैसे ही जब जीव परलोक को जाता है, तब इस जगत् को स्वप्न जानता है और कहता है कि स्वप्न-सा मैंने देखा था और उसे परलोक सत्य भासित होता है। फिर वहाँ से गिरकर इस लोक में आ पड़ता है, तब इस लोक को सत्य जानता है और जाग्रत् मानता है, तथा उस परलोक को स्वप्नभ्रम मानता है।

हे राम! जब तक शरीर से सम्बन्ध है, तब तक जीव अनेक बार