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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1586, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1586

७८२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है अथवा किसी कारण कार्य से हुआ है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे समुद्र से तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही ब्रह्म में यह प्रतिभा स्वाभाविक उठती है । और जैसे पवन में फुरना स्वाभाविक होता है वैसे ही आत्मा का चमत्कार जगत् की रचना स्वाभाविक होती है । सो वही रूप है, उससे भिन्न नहीं । चिन्मात्र में जो चेतना जगी है, वह जैसी जगी है, वैसे ही स्थित है । जबतक इससे भिन्न और स्फुरण नहीं होता, तबतक वही रहता है । जिस प्रतिभा में कार्यकारण भासित होती है—जैसे शुद्ध चिदाकाश में स्वप्न की सृष्टि भासित होती है—उसमें साररूप वही है । वही चित्त के चमत्कार से जगता है—जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, सो समुद्ररूप हैं, उससे भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही सब शब्द अर्थ से युक्त जगत् जो भासता है, वही चिन्मात्र है, भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जिनका ऐसा यथार्थ अनुभव हुआ है, उनको जगत् स्वप्नरूप और संकल्पनगर भा दिखता है । पृथ्वी आदि पदार्थ पिण्डाकार नहीं दिखते सब ब्रह्म रूप भासित होता है । हे राम ! जो वस्तु व्यभिचारी और नाशवान् है, वह अविद्यारूप है, और जो अव्यभिचारी और अविनाशी है वह ब्रह्मसत्ता है । वह ब्रह्मसत्ता ज्ञानसंविद्रूप है और अपने भाव को कदापि नहीं त्यागती । वह अनुभव से सर्वदा प्रकाश पाती है । उसमें अविद्या कैसे हो ? जैसे समुद्र में धूल का अभाव है, वैसे ही आत्मा में अविद्या का अभाव है । जो सब आकार दिखते हैं, वे सब चिदाकाश रूप हैं—जैसे तुम अपने मन में संकल्प रचकर इन्द्र हो बैठो और चेष्टा भी इन्द्र की सी करने लगो, अथवा ध्यान में इन्द्र को रचो और ध्यान से प्रतिभा सिद्ध हो आवे तो जबतक वह संकल्प रहेगा, तब तक वही भासित होगा । जब इन्द्र का संकल्प क्षीण हो जायगा, तब इन्द्र की चेष्टा भी निवृत्त हो जायगी । सो संकल्प से वही चिन्मात्र इन्द्ररूप होकर भासित होता है; वैसे ही यह सब जगत् जो दिखता है, वह सब चिन्मात्ररूप है पर संवेदन द्वारा पिण्डाकार होकर भासित होता है । जब संवेदन जगना निवृत्त होता है, तब सब जगत् आत्मरूप भासित होता है ।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1586, कुल 1734 में से · BharatKosha