योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1585, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८१
जगत् भासित होता है । जिसकी भावना धर्म की ओर होती है और जो सकाम होता है, उसको स्वर्गादिक सुख भासित होते हैं और जिसकी भावना अधर्म में होती है, उसको नरकादिक भासित होते हैं। शुभ कर्मों से शान्ति की आशा हो सकती है । शुभ भी दो प्रकार के हैं—एक से स्वर्गसुख भासित होते हैं और दूसरे को सिद्ध की भावना से सिद्ध-लोक भासित होते हैं । जिसको अशुभ भावना होती है, उसको नाना प्रकार के नरक दिखते हैं । हे राम ! जब यह संवित् अनात्म में आत्म-अभिमान करती है और उनके कर्मों में अपने को कर्त्ता जानती है, वह पाप करके ऐसे अनेक दुःखों को प्राप्त होती है, जो कहे नहीं जाते—जैसे पहाड़ों में दब जाने से बड़ा कष्ट होता है अथवा अङ्गारों की वर्षा और अन्धे कूप में गिरने से कष्ट होता है । पर-स्त्री के भोगने से अङ्गारों में जलना होता है और अग्नि-तप्त लोहे को कण्ठ लगाना पड़ता है । जिस स्त्री ने परपुरुष को भोगा है, वह अन्धे कूपरूप ओखली में खड्गरूपी मूसल से कुटती है । जो देहाभिमानी देवतों, पितरों और अतिथि को दिये विना भोजन करता है, उसको भी यम के दूत बड़ा कष्ट देते हैं । खड्ग और बरछी से उसके मांस को काटते और प्रहार करते हैं । वे परलोक में क्षुधा और तृष्णा से कष्ट पाते हैं । जिन नेत्रों से व्यभिचारियों ने पर-स्त्री देखी हैं, उन पर छुरी का प्रहार होता है । एक वृक्ष है, जिसके पत्ते खड्ग के प्रहार की नाईं लगते हैं और शूली के ऊपर चढ़ने से लेकर अनेक कष्ट उनको प्राप्त होते हैं । जो शुभकर्म करते हैं, वे स्वर्ग भोगते हैं । इससे जीव जैसे-जैसे कर्म करते हैं, उनके अनुसार जगत् देखते हैं और जिन-जिन भावों का चिन्तन करते शरीर त्यागते हैं, वे उनको प्राप्त होते हैं । केवल वासनामात्र संसार है । जैसा निश्चय होता है वैसा ही भासित होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वर्गनरकप्रारब्धवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४४ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो तुमने मुनीश्वर और वधिक का वृत्तान्त कहा, सो बड़ा आश्चर्यरूप है । यह वृत्तान्त स्वाभाविक हुआ