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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1584, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1584

७८० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

विचार करने से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मविचार करने से अविद्या के विलासरूप जगत् का अभाव हो जाता है । जिसको आत्मा का प्रमाद है, उसको देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि इष्ट-अनिष्ट अनेक प्रकार के पदार्थ दिखते हैं और कारण-कार्य भाव से जगत् भी स्पष्ट दिखता है, पर जिसको आत्मा का अनुभव हुआ है, उसको सब आत्मा ही दिखता है। हे राम! एक दृष्ट और दूसरी अदृष्ट सृष्टि है । यह जो प्रत्यक्ष दिखती है, वह दृष्ट सृष्टि है और जो देखने में नहीं आती वह अदृष्ट सृष्टि है । पर दोनों तुल्य हैं। सिद्ध लोग आकाश में जो सृष्टि रच लेते हैं, वह संकल्पमात्र होती है । उनकी सृष्टि परस्पर अदृष्ट है और अनेक प्रकार की रचना है। उनकी सुवर्ण की पृथ्वी है । वह रत्न और मणियों से जड़ी हुई है । उसमें अनेक प्रकार के पदार्थ हैं अमृत के कुण्ड भरे हुए हैं । उनके अधीन तम और प्रकाश है और अनेक प्रकार की रचना बनी हुई है । वह सब संकल्पमात्र है । इसी प्रकार यह जगत् संकल्पमात्र है । जैसा-जैसा संकल्प होता है, वैसी ही वैसी सृष्टि आत्मा में ही भासित होती है । हे राम! आत्मारूपी डिब्बे में सृष्टिरूपी अनेक रत्न हैं । जिस पुरुष को आत्मदृष्टि प्राप्त हुई है, उसको सब सृष्टि आत्मरूप है । और जिसको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई है, उसको सब जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है । जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही पदार्थ होकर भासित होता है । जो कुछ जगत् दिखता है, वह सब संकल्पमात्र है । जो तुमको ऐसा तीव्र संवेग हो कि आकाश में नगर स्थित हो तो वही दिखने लगे ।

हे राम! जिस ओर मनुष्य दृढ़ निश्चय करता है, वही सिद्ध होता है । जो आत्मा की ओर एकाग्र होता है, तो वही सिद्ध होता है और जो दोनों ओर जाता है तो भटकता है । जो जगत् की सत्यता को छोड़कर आत्मपरायण हो रहे तो तीव्र भावना से मोक्ष प्राप्त होती है । और जो संसार की ओर भावना होती है, तो संसार की प्राप्ति होती है । निदान जैसा अभ्यास करता है, वही सिद्ध होता है । वास्तव में सृष्टि कुछ हुई नहीं, वही रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, उसके अनुसार

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