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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1579, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1579

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ७७५

वस्तु वही है, जो मनसहित षट्इन्द्रियों से अगम्य है और वह आत्म-सत्ता है, जिससे यह सब है और जिसमें सब है । ऐसी आत्मसत्ता परमसत्ता है और उसमें सब कुछ बनता है । हे रामजी ! जगत् संकल्प-मात्र है, संकल्प का मिलना क्या आश्चर्य है ? छाया और धूप की तरह सत्य और झूठ और ज्ञान और अज्ञान इकट्ठे नहीं होते, परन्तु आत्मा में इकट्ठे होते दीखते हैं ।

हे रामजी ! जब मनुष्य शयन करता है, तब अनुभवरूप होता है, फिर स्वप्न में स्वप्न-नगर भासित होता है, छाया और धूप भी भासित होता है और ज्ञान-अज्ञान, सच-झूठ भी भासित होते हैं । जैसे आकाश में विरुद्ध पदार्थ भासित होते हैं, वैसे ही संकल्प से संकल्प मिल जाता है; इसमें क्या आश्चर्य है ? सब जगत् आकाशवत् शून्य निराकार निर्विकार है । निराकार में आकार और निर्विकार में विकार दिखते हैं, यही आश्चर्य है । सब आकार जो दृष्टिगोचर होते हैं, वे वही निराकाररूप हैं; ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । जगत् को असत्य कहते भी नहीं बनता । जो असत्य होता है तो प्रलय होकर पृथ्वी, अप्, तेज और वायु से आकाश फिर प्रकट न होता । पर प्रलय होने के बाद ये फिर उत्पन्न होते हैं, इससे असत्य नहीं हैं । चैतन्यरूप आत्मा का ही स्वभाव है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । हे रामजी ! जब प्रलय होता है, तब सब भूत पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और फिर उत्पन्न होते हैं । इसी से यह सृष्टि आत्मा का आभासमात्र है । ब्रह्मसत्ता में अनन्त जगत् फुरते हैं, पर जीव अपनी-अपनी सृष्टि ही को जानते-हैं । सब जीव ब्रह्मरूपी समुद्र के कण हैं, उनमें से एक सृष्टि को दूसरा नहीं जानता । जैसे सिद्धों की सृष्टि अपने अपने अनुभव में जगती है और जैसे स्वप्न की सृष्टि भिन्न भिन्न होती है, वैसे ही यह अपनी-अपनी सृष्टि अलग है और मिल भी जाती है । आत्मा में सब कुछ बनता है । जो अनादि और आदि, विधि और निषेध, विकार और निर्विकार इकट्ठे नहीं होते, वे आकाश में आत्म-सत्ता और स्वप्न में इकट्ठे दिखते हैं । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । जगत्