योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1578, कुल 1734 में से
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विचरता था। इतने में उसका राजा शिकार खेलने चला और उसने मुझको देख मेरे पीछे घोड़ा दौड़ाया। आगे-आगे मैं दौड़ता जाता था और पीछे घोड़ा था, पर उसका वेग ऐसा तीव्र था कि उसने मुझको पकड़ लिया और अपने घर ले आया। तीन दिन उसने मुझे घर में रखा, परन्तु मेरी बहुत सुन्दर क्रीड़ा देखी, इस कारण प्रसन्नता से यहाँ ले आया। हे राजा दशरथ! अब मैंने मृग के शरीर को त्यागकर मनुष्य का शरीर पाया है। तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब तुमसे मैंने कहा।
वाल्मीकिजी बोले, हे अङ्ग! जब इस प्रकार विपश्चित् कह चुका तब रामजी ने विपश्चित् से प्रश्न किया कि हे विपश्चित्! वह मृग तो और सृष्टि का था, यहाँ क्योंकर आया? भास बोले, हे रामजी! जहाँ वह मिला था वह स्थान भी और सृष्टि का था। एक समय दुर्वासा ऋषीश्वर आकाशमार्ग में ध्यान लगायेबैठे थे कि उसी मार्ग से इन्द्र पृथ्वी पर यज्ञ करने के लिए चले आ रहे थे। दुर्वासा को शव जानकर इन्द्र ने उनको लात से ठुकराया। तब दुर्वासा ने समाधि से उठकर इन्द्र की ओर देखा और शाप दिया कि हे शक्र! तूने मुझे जानकर भी गर्व करके पैर लगाया, इसलिए तेरे यज्ञ को एक शव नष्ट करेगा और जिस स्थान पर वह गिरेगा, वह पृथ्वी भी नष्ट होगी। इस ऋषि ने जब ऐसे शाप दिया और इन्द्र यज्ञ करने लगे, तब और सृष्टि से वह शव आ गिरा और पृथ्वी चूर्ण हो गई। वह तो उस प्रकार गिरा और मैं तपरूपी मुनीश्वर के वर से मृग होकर तुम्हारी सभा में आया। हे रामजी! जो स्वप्न की सृष्टि का था, वह जो असत्य होता तो प्रकट न होता और जो सत्य होता तो स्वप्नरूप न होता। हे रामजी! तुम हमारी स्वप्न की सृष्टि में हो और हम तुम्हारी सृष्टि के स्वप्न में हैं। जैसे स्वप्न पदार्थों का होना हुआ है, वैसे ही शव का और मृग का भी होना हुआ है। जैसे यह सृष्टि है, वैसे ही वह सृष्टि भी है। जो यह सृष्टि सत्य है तो वह भी सत्य है; परन्तु वास्तव में न यह सत्य है और न वह सत्य है। यह भी भ्रममात्र है और वह भी भ्रममात्र है। सत्य