योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1577, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७७३
जब अन्तर्धान हो गये, तब मैं वहाँ से चला । और एक सृष्टि में गया तो वहाँ और प्रकार के शास्त्र और ही प्रकार के प्राणी देखे । फिर आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ ऐसे प्राणी देखे, जिनकी टाँगें काठ की और आचरण मनुष्य का था । आगे और सृष्टि में गया तो उसमें लोगों के शरीर तो पाषाण के थे, पर वे दौड़ते और सब व्यवहार करते थे । उसके उपरान्त और सृष्टि में गया । वहाँ शास्त्ररूपी उनकी मूर्ति थी । उसके आगे गया तो वहाँ क्या देखा कि प्राणी बैठे ही रहते हैं और जोर से बातें करते हैं, पर न कुछ खाते हैं और न पीते हैं । हे राजा दशरथ ! इस प्रकार जब मैं चिरकाल तक फिरता रहा, पर अविद्या का अन्त कहीं न आया, तब मैंने विचार किया कि आत्मज्ञानी हो जाऊँ, तब अन्त आवेगा, और किसी प्रकार अन्त न आवेगा । इस प्रकार विचार कर मैं एक वन में गया और ज्ञान की सिद्धि के लिए तप करने लगा । जब कुछ काल तप किया तब चित्त में यह भावना उपजी कि किसी प्रकार सन्तों के निकट जाऊँ तो उनकी संगति से मुझको शान्तिपद प्राप्त होगा ।
हे राजन् ! यह विचार कर मैं वहाँ से चला और कल्पवृक्ष के वन में आया । वहाँ एक पुरुष मुझको मिला । उसने कहा, हे साधो ! तू कहाँ जा रहा है, मेरे पास तो आ ? तब मैंने उससे पूछा कि तू कौन है ? उसने कहा कि मैं तेरा तप हूँ, जो तूने किया है । अब तू कुछ वर माँग, वह मैं तुझको दे दूँ । तब मैंने कहा कि हे साधो ! मेरी इच्छा यही है कि मैं आत्मपद को पाऊँ । उसने कहा, हे साधो ! अब तुझे मृग का एक जन्म और पाना है । जब वह तेरा शरीर अग्नि में जलेगा, तब तू मनुष्य का शरीर पावेगा और ज्ञानवानों की सभा में जावेगा । उस सभा में जब तू मनुष्य-शरीर धरेगा, तब तुझे सब जन्मों और कर्मों की स्मृति हो जावेगी और स्वरूप की प्राप्ति होगी । इस-लिए तू अब मृगशरीर धारण कर । हे राजा दशरथ ! इस प्रकार जब उसने कहा, तब मैंने सोचा कि मृग होऊँ । मुझे स्वप्नरूप प्रतिभा जगी जिससे मैं मृग हो गया । तुम्हारी सृष्टि में एक पहाड़ की कन्दरा में मैं