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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1576, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1576

७७२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

ने कहा कि मेरा शरीर बड़ा हो और मैं अविद्या को देखूँ। हे राजन् ! यद्यपि बधिक ने जाना कि यह वर माँगने से मेरा भला न होगा, परन्तु दृढ भावना के बल से जानकर भी यही वर माँगा कि घड़ी-घड़ी में मेरा शरीर योजन भर बढ़े। ब्रह्माजी ने कहा कि ऐसा ही होगा। ब्रह्माजी यह कहकर जब अन्तर्धान हो गये, तब उसका शरीर बढ़ने लगा। एक घड़ी में एक योजन बढ़ते-बढ़ते कल्पपर्यन्त बढ़ता गया और कई ब्रह्माण्डों तक चला गया। पर जिस ओर को वह देखता था, उस ओर अविद्यारूपी अनन्त सृष्टियाँ उसे दिखती थीं। निदान जब वह चलते-चलते थक गया, तब उसने विचारा कि अविद्या का तो अन्त नहीं आता, इस शरीर को मैं कहाँ तक उठाये फिरूँ ? अब इसका त्याग करूँ, तभी आत्मपद पाऊँगा। हे राजा विपश्चित् ! तब उसने प्राण को ऊपर खींचकर शरीर को त्याग दिया। यह वही शरीर यहाँ आ पड़ा है। जिस ब्रह्माण्ड से यह गिरा है, वह हमारे स्वप्न की सृष्टि है, अर्थात् यह अन्य सृष्टि का था, इस सृष्टि में इसकी स्वप्नवत् प्रतिभा हुई थी, और यहाँ जाग्रत् दृष्टि में आ पड़ा है। पृथ्वी, पहाड़ आदि सबको उसने नाश कर डाला है। जहाँ से यह गिरा है, वहाँ आकाश में तरुवर की नाईं दिखता था और यहाँ इस प्रकार गिरा है, जैसे इन्द्र का वज्र हो।

हे विपश्चितों में श्रेष्ठ ! वही बधिक का महाशव था। जब उसका शरीर गिरा, तब भगवती ने उसका रक्तपान किया, इसलिए उसका नाम रक्ता—भगवती हुआ। उसके शरीर का शेष अंश सो पृथ्वी हुआ। जब चिरकाल व्यतीत हुआ, तब मृत्तिका पृथ्वी हो गई और उस पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ा। ब्रह्माजी ने जो नवीन सृष्टि रची है उस पृथ्वी पर अब कल्याण हुआ है। इससे अब जहाँ तेरी इच्छा हो, वहाँ जा और मैं भी अब जाता हूँ। इन्द्र को यज्ञ करना है और उन्होंने मेरा आवाहन किया है, वहाँ मैं जाता हूँ। भास बोले, हे राजा दशरथ ! इस प्रकार मुझसे कहकर अग्नि देवता अन्तर्धान हो गये। जैसे महा-श्याम मेघ से दामिनी चमक कर अन्तर्धान हो जाती है, वैसे ही अग्नि