योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1575, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७७१
सिद्ध राजा होगा और मन्त्री तुझको उपदेश करेगा, तब तू राज्य को त्यागकर वन में जायगा और उपदेश करनेवाला मन्त्री दूसरे मन्त्रियों और सेना सहित तुझसे कहेंगे कि तू राज्य कर, परन्तु तेरा चित्त विरक्त होगा और तू राज्य अङ्गीकार न करेगा। उस वन में किसी सन्त के स्थान में जाकर तू ठहरेगा और परम वैराग्य संपन्न होगा, तब उनकी बातों का और प्रसंग का तुझ पर प्रभाव होगा। यदि सन्तों से कुछ न माँगिये तो भी वे अमृतरूपी वचनों की वर्षा करते हैं—जैसे पुष्पों से बिना माँगे ही सुगन्ध प्राप्त होती है, वैसे ही सन्तजनों से माँगे बिना ही ज्ञान का अमृत प्राप्त होता है। जब मनुष्य सन्तों के अमृत-वचन सुनता है, तब उसके मन में यह विचार उत्पन्न होता है कि 'मैं कौन हूँ', 'यह जगत् क्या है' और 'जगत् किससे उपजा है'? निदान तू उनका उपदेश पाकर जानेगा कि मैं अचेत चिन्मात्रस्वरूप हूँ और जगत् मेरा आभास है। चित्त का फुरना ही जगत् का कारण है। वह चित्त ही मुझमें नहीं है, तो जगत् कैसे हो? जगत् तो मुझ में नहीं है; मैं अपने ही रूप में स्थित हूँ। हे बधिक! इस प्रकार जब तू मन को सब विषयों से शून्य करके अपने स्वरूप में स्थित होगा, तब परमानन्द निर्वाण पद तुझे प्राप्त होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सिद्धनिर्वाणवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४२ ॥
मुनीश्वर बोले, हे बधिक! इस प्रकार जो तेरी भावी थी, वह सब मैंने तुझसे कही। अब जो भला जान पड़े, वह कर। अग्नि बोले, हे राजा विपश्चित्! मुनीश्वर ने जब बधिक से इस प्रकार कहा, तब उसे आश्चर्य हुआ। वह वहाँ से उठकर मुनीश्वर सहित स्नान करने गया। निदान दोनों तप करने और शास्त्र को विचारने लगे। कुछ काल के उपरान्त मुनीश्वर का निर्वाण हो गया। केवल बधिक ही यह विचार कर कि किसी प्रकार मेरी अविद्या नष्ट हो, तप करने लगा। हे राजा विपश्चित्! सौ युग तक जब बधिक ने तप किया, तब ब्रह्माजी देवताओं को साथ लेकर आये और बोले कि कुछ वर माँग। तब बधिक