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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1574, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1574

७७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जन्म पाते चले जाते हैं, यदि दैव-संयोग से कभी मुक्त पुरुष की संगति प्राप्त भी होती है तो उसे छोड़ जाते हैं, वे तामस-तामसी हैं। जिनको स्वरूप का प्रमाद हुआ है और तामसी कर्मों की रुचि है, वे उन कर्मों के अनुसार जन्म पाते जाते हैं। जो हट पड़े और तामसी कर्मों को त्यागकर मोक्षपरायण होते हैं, वे केवल तामसी हैं। पर वे तामस-तामसी से श्रेष्ठ हैं। हे राजन् ! तुम तामस-तामसी थे, इस कारण सरस्वती से तुम अपनी जय ही माँगते रहे और मोक्ष का अभ्यास तुमने नहीं किया ।

राजा पूछेगा, हे निर्मलचित्त, मन्त्रिन् ! मैं तामस-तामसी था, इस कारण मोक्ष की इच्छा न की, परन्तु अब मुझसे तुम वही उपाय कहो जिससे मेरा अहंभाव निवृत्त हो और आत्मपद की प्राप्ति हो। मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! निश्चय करके जानो, जो कोई कैसे ही पदार्थ की इच्छा करे, वह पदार्थ अभ्यास से अवश्य प्राप्त होता है। जिसकी भावना करके वह अभ्यास करता है, वह पदार्थ निसन्देह प्राप्त होता है। जो जिसका दृढ़ अभ्यास करता है, वह वही रूप हो जाता है। त्रिलोकी में ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो अभ्यास से न मिल सके । जो प्रथम दिन में कोई विकर्म किसी से हुआ हो और अगले दिन शुभ कर्म करे तो वह विकर्म लुप्त हो जाता है और शुभ कर्म ही मुख्य हो जाता है। जब तुम आत्मपद का अभ्यास करोगे, तब तुमको आत्मपद प्राप्त होगा, और तुम्हारा तामस-तामसी भाव निवृत्त हो जावेगा। हे राजन् ! जो पुरुष कोई पदार्थ पाने की इच्छा करता है और हटकर नहीं फिरता तो वह अवश्य उसको पाता है। मनुष्य को देह-इन्द्रियों का अभ्यास दृढ़ हो रहा है, उससे फिर-फिर देह और इन्द्रियाँ ही पाता है। जब उनसे पलटकर आत्मा का अभ्यास करे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और देह-इन्द्रियों का वियोग हो जावेगा। इसलिए आप भी सदा आत्मपद का अभ्यास करें तो उससे आपको आत्मपद प्राप्त होगा।

इतना कह फिर मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! इस प्रकार जब तू

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