योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1573, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❀ निर्वाण प्रकरण ❀ ७६६
कर प्रमाद से देहादिक की कल्पना की है। राजा पूछेगा, हे साधो ! आत्मा तो निष्किञ्चन और केवल निर्विकार है, उसमें तामसी देह कहाँ से उपजी ? मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! जैसे स्वप्न में प्रमाद से तामसी देह दिखती है, परन्तु होती नहीं, वैसे ही ये आकार भी दिखते हैं, परन्तु होते नहीं, अज्ञान से भासित होते हैं। इससे तुझको प्रमाद हुआ है, इसी से वासना के अनुसार जन्म पाता फिरा है। इस प्रकार तेरे बहुत जन्म बीते हैं। परन्तु पिछला शरीर जो तूने भोगा है, वह तामस-तामसी था, इस कारण तुझको मोक्ष की इच्छा नहीं हुई।
हे राजन् ! तुम्हारे जो जन्म बीते हैं, उनको मैं जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते। राजा कहेगा, हे निर्मल आत्मा ! तामस-तामसी किसको कहते हैं ? मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! एक सात्त्विक-सात्त्विकी है, दूसरा केवल सात्त्विकी है, तीसरा राजस-राजसी है, एक तामस-तामसी है, और एक केवल तामसी है। इन्हें अलग-अलग सुनो। हे राजन् ! निर्विकल्प अद्वैत, चिन्मात्र सत्ता से जो संवित् फुरी है, जिसकी अहंप्रतीति अधिष्ठान में रही है, जो निश्चय को नहीं प्राप्त हुए और अनात्मभाव को भी स्पर्श नहीं किया, ऐसे जो ब्रह्मादिक हैं, वे सात्त्विक-सात्त्विकी हैं। जिनको सात्त्विकी पदार्थ भासित होने लगे हैं और स्वरूप का प्रमाद है, उनका बुद्धि से स्पर्श हो अथवा न हो, वे केवल सात्त्विकी हैं। जिनकी संवित् का बुद्धि से सम्बन्ध हुआ है और नाना प्रकार के राजसी पदार्थों में सत्य प्रतीति हुई है, जिन्हें राजसकर्मों में दृढ़ अभ्यास है और उसके अनुसार शरीर को धारण करते चले गये, पर स्वरूप की ओर नहीं आये और चिरकाल तक ऐसे ही रहे, वे राजस-राजसी हैं। जिनको बोध में अहंप्रतीति नहीं, स्वरूप का प्रमाद है, जगत् सत्य भासित होता है, राजसी पदार्थों में अधिक प्रीति है और राजसी कर्मों का अभ्यास है, उसके अनुसार जन्म पाते हैं और फिर शीघ्र ही स्वरूप की ओर आते हैं, वे केवल राजसी हैं, और राजस-राजसी से श्रेष्ठ हैं। जिनको स्वरूप का प्रमाद है और जगत् में सत्य प्रतीति हुई है एवम् उस जगत् के ताम कर्मों में दृढ़ अभ्यास हुआ है, वे महामूढ़ उसमें चिरकाल तक