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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1572, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1572

७६८ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

जाकर युद्ध करेगा। अंत में उसकी टाँग काटकर कुल्हाड़े से उसको मारकर अपने घर लौटेगा। सब दिक्पाल तुझसे डरने लगेंगे। तू बड़ा तेजस्वी होगा।

बड़ा आश्चर्य है कि विदूरथ को जीतकर जब तू यमपुरी भेजेगा, तब कहेगा कि हे मन्त्रियो ! इसमें क्या आश्चर्य है ? मेरे भय से तो दिक्पाल भी काँपते हैं। प्रलयकाल के समुद्र और मेघ के समान मेरी सेना है, जिसका ओरछोर नहीं है। मेरे विदूरथ को जीतने में क्या आश्चर्य है ? तब मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! इतनी सेना तुम्हारे साथ है तो क्या हुआ, उस विदूरथ की स्त्री लीला को तुम नहीं जानते। उसने तप करके एक देवी को प्रसन्न किया है, जिसके क्रोध करने से सम्पूर्ण विश्व का नाश हो सकता है। वह माता सरस्वती ज्ञानशक्ति और सब भूतों के हृदय में स्थित है। जैसा उसमें कोई अभ्यास करता है, उसे सरस्वती सिद्ध करती है। हे राजन् ! वह राजा और उसकी स्त्री लीला सरस्वती से मोक्ष माँगते थे कि किसी प्रकार हम संसारबन्धन से मुक्त हों, इस कारण वे मुक्त हुए और तुम्हारी जय हुई। राजा पूछेगा, हे अज्ञ ! जो सरस्वती मेरे हृदय में स्थित है, तो मुझको मुक्त क्यों नहीं करती ? मैं भी तो सदा सरस्वती की उपासना करता हूँ। मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! सरस्वती ही चित्संवित् है। उसमें जैसा निश्चय होता है, वही सिद्ध होता है। हे राजन् ! तुम सदा अपनी जय ही माँगते थे, इससे तुम्हारी जय हुई और वह मुक्ति माँगता था, इससे उसकी मुक्ति हुई। उसका पिछला संस्कार उज्ज्वल था, इससे मुक्त हुआ, और तुम्हारा पिछले जन्म का संस्कार तामसी था, इस कारण तुमको मोक्ष की इच्छा न हुई और शान्ति भी न प्राप्त हुई। आदि परमात्मसत्ता से सब पदार्थ प्रकट हुए हैं। केवल आत्मसत्ता, जो निष्किञ्चन पद है, सदा अपने स्वभाव में स्थित है। उसी में चेतनता (संवेदन) फुरती है। 'अहं अस्मि' अर्थात् 'मैं हूँ' इस भावना का नाम चित्त है। इसी चेतनता ने देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदि दृश्य जगत् की कल्पना की है। उस कल्पना से विश्व चित्त में स्थित है और चित्त ने आत्मा से फुरा