योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1571, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६७
आत्मा को स्पर्श न करे तो कोई कर्म बन्धन नहीं करता, क्योंकि उसको अद्वैत आत्मा का अनुभव होता है और द्वैतरूप कर्म नहीं दिखाई देते । सब सुख-दुःख आत्मरूप हो जाते हैं। कर्म तब तक बन्धन करते हैं, जब तक आत्मबोध नहीं हुआ । जब आत्मबोध होता है, तब सब कर्म भस्म हो जाते हैं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भविष्यत्कथावर्णनं नाम द्विशताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४१ ॥
व्याध बोला, हे भगवन् ! यह जो तुमने मुझसे कहा वह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ । शरीर गिरने के उपरान्त मेरी क्या दशा होगी ? मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! जब तेरा शरीर गिरेगा, तब तेरी संवित् प्राण-वासना सहित आकाशरूप महासूक्ष्म अणु के समान हो जावेगी । उस संवित् में तुझको फिर नाना प्रकार का जगत् दिखेगा । पृथ्वी, देश, काल, पदार्थ सब भासित होंगे । जैसे सूक्ष्म संवित् में स्वप्न का जगत् भासित होता है, वैसे ही तुझको जगत् भासित होगा । वहाँ तेरी संवित् में यह फुरेगा कि मैं अष्टवसुओं के समान राजा हूँ । मेरे पिता का नाम इन्द्र और माता का नाम प्रद्युम्न की पुत्री बधलेखा है । मेरे पिता मुझको राज्य देकर वन को गये हैं और तप करने लगे हैं । चारों ओर समुद्रपर्यन्त मेरा राज्य है । हे बधिक ! वहाँ तेरा नाम विदूरथ होगा । कई सौ वर्ष तक तू राज्य करेगा और नाना प्रकार के विषयों को भोगेगा । हे बधिक ! विदूरथ नाम का एक राजा पृथ्वी पर होगा । वह तेरे साथ शत्रुता करेगा । तेरी पृथ्वी और सीमा लेने का यत्न करेगा । तब तू मन में विचार करेगा कि मैं बड़ा सिद्ध हूँ, और कई सौ वर्ष मैंने निर्विघ्न भोग भोगे हैं। अब इस विदूरथ नाम के शत्रु का नाश करूँ । हे बधिक ! उसको मारने के लिए तू सेना लेकर चढ़ाई करेगा । वह तेरी चारों प्रकार की सेना नाश को प्राप्त होगी । इस प्रकार हाथी, घोड़े, रथ और प्यादेवाली दोनों ओर की सेना नष्ट होगी । तुम दोनों रथ से उतरकर परस्पर युद्ध करोगे । तुम्हारे भी बहुत शस्त्र लगेंगे और शरीर घायल होगा । तो भी तू शत्रु के सम्मुख