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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1570, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1570

७६६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, जब ज्ञान होता है और आत्मज्ञान तब होता है, जब सतशास्त्रों का विचार और सन्तों का सङ्ग होता है। जब संग और सतशास्त्र मुझको प्राप्त हों, तब ज्ञान उपजेगा। यह तो मुझको ऐसा शरीर प्राप्त हुआ है, जिसका बड़ा भार उठाये फिरता हूँ। अनेक सुमेरु पर्वत भी इसके आगे तृण से हल्के हैं। ऐसा भारी मेरा शरीर है। इस शरीर से मैं किसकी संगति करूँ और किस प्रकार शास्त्र श्रवण करूँ? यह शरीर मुझको दुःखदायी है, इससे इस शरीर का त्याग करूँगा। हे बधिक! ऐसे विचारकर तू प्राणायाम करेगा और उसकी धारणा से शरीर त्याग देगा। जैसे पक्षी फल को खाकर गुठली को त्याग देता है और जैसे इन्द्र के वज्र से खण्डित हुए पर्वत गिरते हैं, वैसे ही एक सृष्टि-भ्रम में तेरा शरीर गिरेगा। उसके नीचे कई पर्वत, नदियाँ और जीव चूर्ण होंगे। वहाँ बड़ा खेद होगा। तब सब देवता चण्डिका की आराधना करेंगे। तब वह चण्डिका भगवती तेरे शरीर को भक्षण कर जावेगी। तब सृष्टि में फिर कल्याण होगा। इस वन में जो तमाल वृक्ष हैं, उनके नीचे तू तप करेगा। यह मैंने तेरा भविष्य कहा। अब जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर।

व्याध बोला, हे भगवन्! बड़ा कष्ट है कि मैं इतने खेद को प्राप्त होऊँगा। इससे कोई ऐसा उपाय करो, जिससे यह भावना निवृत्त हो जावे।

मुनीश्वर बोले, हे बधिक! जो कुछ होना है, वह कभी अन्यथा नहीं होता—जो कुछ शरीर की प्रारब्ध है, वह अवश्य होती है। जैसे चिल्ले से छूटा बाण तब तक चला जाता है जब तक उसमें वेग होता है, और जब वेग समाप्त हो जाता है, तब वह पृथ्वी पर गिर पड़ता है, अन्यथा नहीं गिरता, वैसे ही जैसा प्रारब्ध का वेग है, वैसा ही होगा। भावी टलने की नहीं। अतः जीव उसमें बायाँ चरण दाहिने और दाहिना बायें नहीं कर सकता—जो होना है, वही होगा। ज्योतिषशास्त्रवाले जो भविष्य दशा पहले कहते हैं, वैसा ही होता है, क्योंकि होनी होती है—जो न हो तो क्यों कहें। इससे भावी मिटती नहीं। हे बधिक! मैंने तुझको दो मार्ग बताये हैं। जब तक कर्म की कल्पना स्पर्श करती है, तब तक जीव कर्म के बन्धन से नहीं छूटता। और जो कर्म की कल्पना