योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1539, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७३५
और मरण भी मिथ्या है जो तू कहे कि जब इसके आकार का अभाव देखता है तब जानता है कि वह मर गया तो हे बधिक ! जब यह पुरुष परदेश जाता है तब भी इसका आकार नहीं दिखाई पड़ता । जैसे दृष्टि के अभाव में असत्य होता है, वैसे ही देह के त्याग में भी इसका असत्यभाव होता है । पर इस पुरुष का अभाव कभी नहीं होता । जो तू कहे कि परदेश गया फिर आ मिलता है, पर शरीर के त्यागने पर फिर नहीं मिलता तो परदेश गया फिर मिलकर बातचीत करता है और मृतक तो कभी चर्चा नहीं करता, तो जिसके पितर प्रीति में बँधे हुए मरते हैं और जिनकी यथाशास्त्र क्रिया नहीं होती, वे स्वप्न में आ मिलते हैं और बताते हैं कि हमारी क्रिया तुमने नहीं की; हम अमुक स्थान में पड़े हैं या अमुक द्रव्य अमुक स्थान में गड़ा है; तुम निकाल लो । जैसे पर-देसी लौटकर मिलते हैं और वार्ता-चर्चा करते हैं, वैसे ही मृतक भी करते हैं, यह सिद्ध है । हे बधिक ! वास्तव में न कोई जगत् है और न कोई मरता है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और जैसा-जैसा उसमें स्फुरण फुरता है, वैसा ही भासित होता है ।
हे बधिक ! अनुभव एक कल्पवृक्ष है, जैसा-जैसा उसमें फुरता है, वैसा ही वैसा भासित होता है । एक संकल्पसिद्ध और एक दृष्टिसिद्ध वस्तु है । जब इनकी दृढ़ भावना होती है, तब ये दोनों सिद्ध होती हैं । जो इन्द्रियों में दृश्य पदार्थ हैं, वे दृष्टिसिद्ध वस्तु कहाते हैं । जो इनकी भावना होती है तो यही प्राप्त होते हैं । और जो अपने मन में आपही मान लीजिये कि मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र (वर्ण) हूँ, अथवा गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी या संन्यासी (आश्रम) हूँ तो यह संकल्प सिद्ध है । जब तक इनका अध्यास होता है, तब तक आत्मसत्ता की प्राप्ति नहीं होती और जब आत्मसत्ता का अध्यास होता है, तब इन दोनों का अभाव हो जाता है और आत्मा ही प्रत्यक्ष अनुभव से दिखता है । हे बधिक ! जिस वस्तु का अभ्यास होता है, उसकी यदि भावना करे और थककर उसे छोड़े नहीं तो वह अवश्य प्राप्त होती है । पर अभ्यास अथवा अभ्यास के बिना कुछ नहीं सिद्ध होता । जैसे कोई