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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1540, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1540

७३६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

पुरुष कहे कि मैं अमुक देश जाता हूँ तो जब तक उसकी ओर वह चले नहीं, तब तक अनेक उपाय को करने से भी वह देश नहीं प्राप्त होता और जब उसकी ओर चलेगा तब पहुँच जायगा, वैसे ही जब बहुत एकाग्र होकर आत्मा का अभ्यास करेगा तब उसको आत्मा प्राप्त होगा, अन्यथा आत्मपद को वह न पहुँचेगा। हे वधिक! जिस पुरुष को जगत् के पदार्थों की इच्छा हो, उसको आत्मपद नहीं प्राप्त होता। जिसको आत्मपद की इच्छा है, उसको वही प्राप्त होगा, जगत् के पदार्थ न भासित होंगे। यदि ऐसी भावना हो कि मेरी देवता की सी मूर्ति हो और उससे मैं स्वर्ग में विचरूँ और एक रूप से भूलोक में मृग होकर भ्रमण करूँ तो दृढ़ अभ्यास से वही हो जाता है; क्योंकि जगत् संकल्प-मात्र है। जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसा ही भासित होता है। हे वधिक! दो रूप की क्या बात है, जो सहस्रमूर्ति की भावना करे तो वही तद्रूप हो जायगा। यह मनुष्य जैसी भावना करता है, वैसा ही हो जाता है। यह अविद्याकृत जगत् भ्रममात्र है इसकी भावना त्यागकर आत्मपद का अभ्यास कर, तब तेरे दुःख जावेंगे।

इति श्रीयोगवाशिष्ठेनिर्वाणप्रकरणे महाशवोपाख्याने निर्णयोपदेशो नाम द्विशताधिकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३० ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक! जैसे अगाध समुद्र में अनेक तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में अनेक सृष्टियाँ फुरती हैं। जीव जीव की अपनी अपनी सृष्टि है, परन्तु परस्पर एक दूसरे को अज्ञात है, एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता। जैसे एक ही स्थान में दो पुरुष सोये हों तो उनकी अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है, पर एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, परस्पर दोनों अज्ञात होते हैं, वैसे ही सब सृष्टि आत्मा में फुरती है; परन्तु एक की सृष्टि को दूसरा जीव नहीं जानता। जो धारणाभ्यासी योगी है, उसको आन्तर्वाहक शरीर प्रत्यक्ष होता है, और वह दूसरे की सृष्टि को भी जानता है। जैसे एक तालाब का मेढक होता है, एक कूप का मेढक होता है और एक समुद्र का मेढक होता है। सो इनके स्थान तो भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु जल एक ही है।