योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1541, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
७३७
इससे चाहे जैसा मेढक हो, पर उसको जल जानता है कि मुझमें है, वैसे जगत् भिन्न-भिन्न अन्तःकरणों में है, परन्तु आत्मसत्ता के आश्रित है। आदि जो संवेदन उसमें जगा है, वह अन्नवाहक है। जब अन्त-वाहक में योगी स्थित होता है, तब और के अन्तवाहक को भी जानता है। इस प्रकार आत्मा के आश्रय में अन्तवाहक में अनन्त सृष्टि फुरती है। वे आत्मा का किञ्चन हैं, फुरती भी हैं और मिट भी जाती हैं। संवेदन के जगने से सृष्टि उत्पन्न होती है और संवेदन के ठहरने में मिट जाती है, क्योंकि वह आकाशरूप होती है। जैसे वायु के ठहरने में जल एक रूप हो जाता है और जल के सिवा कुछ नहीं दिखती, वैसे ही संवेदन के फुरने में आत्मा में अनन्त सृष्टि भासित होती है, और संवेदन के ठहरने में सब आत्मरूप हो जाती है। तब आत्मा के सिवा कुछ नहीं भासित होता, क्योंकि उससे इतर प्रमाद से दिखता है और फिर कारण-कार्य भ्रम भासित होता है। प्रथम जो सृष्टि उपजी है, वह कारण-कार्य के क्रम और संस्कार से रहित है। पीछे कारण-कार्य क्रम भासित हुआ। फिर उसका संस्कार हृदय में हुआ। तब संस्कारवश वे भासित होने लगी। जिनको स्वरूप का प्रमाद नहीं हुआ, उनको सदा परब्रह्म का निश्चय रहता है और जगत् अपना संकल्पमात्र भासित होता है। और जिनको स्वरूप का प्रमाद होता है, उनको संस्कारपूर्वक जगत् भासित होता है। पर संस्कार भी कुछ वस्तु नहीं।
हे वधिक ! जब जगत् ही मिथ्या है, तब उसका संस्कार कैसे सत्य हो ? परन्तु ज्ञानवान् को इस प्रकार दिखता है और अज्ञानी को स्पष्ट दिखता है। हे वधिक ! जैसे तुम संकल्प के रचे पदार्थ—स्मृति और स्वप्नसृष्टि को असत् जानते हो, वैसे ही मैं इस जाग्रतसृष्टि को असत् जानता हूँ। जैसे मृगतृष्णा का जल असत् दिखता है, वैसे ही मुझको यह जगत् असत्य है। तो फिर कारण, कार्य, कर्म-संस्कार मुझको कैसे भासित हों ? अज्ञानी को तीनों दिखते हैं। हे वधिक ! जब चित्त-संवित् बहिर्मुख होती है, तब जगत् दिखता है और जब अन्तर्मुख होती है, तब अपने स्वरूप को देखती है। जब आत्मतत्त्व का किञ्चन