योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
७०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
बोला कि हे देव ! यह उपद्रव क्योंकर हुआ ? यह सब क्या है और ऐसा शरीर क्यों पड़ा है ? आगे तो कोई भी ऐसा शरीर नहीं देखा-सुना ? अग्नि ने कहा, तू अभी चुप रह। यह सब वृत्तान्त मैं तुझसे कहूँगा, पर प्रथम इसको शान्त होने दे। इस प्रकार अग्नि कहते ही थे कि देवता विद्याधर गन्धर्व और सिद्ध आदि जितने स्वर्गवासी थे, वे सब आकर स्थित हुए और विचार करने लगे कि यह उपद्रव प्रलयकाल के बिना ही हुआ है । इसका नाश करने को देवीजी की आराधना करनी चाहिए । हे राजन् ? यों विचारकर वे देवी की स्तुति करने लगे कि हे देवि, शववाहिनी, चण्डिके ! हम तेरी शरण आये हैं, इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे महाशववृत्तान्तवर्णनंनाम द्विशताधिकचतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २२४ ॥
विपश्चित् बोले, हे दशरथ ! उन देवताओं ने स्तुति करके शव की ओर जो देखा तो क्या देखते हैं कि मानों द्वीप उसके उदर में समा गये हैं, भुजाओं में सुमेरु आदिक पर्वत ढक गये हैं। उसके दूसरे अङ्ग ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गये हैं, नाथ ही पाताल को भी गये हैं। निदान उनकी मर्यादा कहीं पाई नहीं जाती थी। एक ही अंग में पृथ्वी छिप गई। यह देखकर विद्याधर, गन्धर्व और सिद्ध आदि सम्पूर्ण नम्रवत् स्तुति करने लगे--हे अम्बे, चण्डिके ! अपने गण को साथ लेकर इस उपद्रव में हमारी रक्षा करो--हम तेरी शरण आये हैं। हे राजन् ! जब इस प्रकार स्तुति करके देवता आराधना करने लगे, तब चण्डिका आकाशमार्ग से यक्ष, बेताल, भैरव आदि अपने गणों को लेकर आई और जैसे मेघ सब दिशाओं को ढक लेता है, वैसे ही सब ओर से उनके गणों ने आकर आकाश को ढक लिया। चण्डिका ऐसे तेजस्वीरूप को रखे हुए चली आती थीं, मानों अग्नि की नदी चली आती हो। उनके लाल नेत्र, शिर पर पके केश और श्वेत दाँत थे। वह बड़े शस्त्र धारण किये थीं। कई कोटि योजन तक उनका विस्तार था। वह सब दिशा और आकाश अपने शरीर से आच्छादित किये, कण्ठ में
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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मुण्डों की माला पहिने, मुरदे वाहन पर आरूढ़ थीं। परमात्मपद में उनकी स्थित थी। वह ऐसी महाप्रकाशमान थीं, मानो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि के प्रकाश को भी लज्जित कर रही थीं। वह हाथों में खड्ग, मूसल, ध्वजा, उखल आदि नाना प्रकार के शस्त्र धारण किये आकाश में तारागण की नाई गर्जती हुई गणों सहित इस प्रकार चली आती थीं, मानो समुद्र से निकली साक्षात् बड़वाग्नि चली आती हो।
जब वह निकट आईं, तब देवता फिर प्रार्थना करने लगे कि हे अम्बे! इसका नाश करो व अपने गणों को आज्ञा दीजिये कि इसका भक्षण करें। हम इसको देखकर बड़े शोक को प्राप्त हुए हैं और तेरी शरण हैं। इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो। हे राजा दशरथ! जब इस प्रकार देवताओं ने कहा तब चण्डिका ने प्राणवायु को खींचा और शव में जितना रक्त था, वह सब पी गईं। जैसे समुद्र को अगस्त्यजी ने पी लिया था, वैसे ही उन्होंने रक्त पान किया। जब उससे देवी का उदर और अङ्ग सब पूर्ण हो गये और नेत्र लाल हो आये, तब देवी नृत्य करने लगीं। उनके सब गण उस शव को खाने लगे, कई मुख को खाने लगे, कई भुजा को, कई उदर को, कई वक्षःस्थल को, कई टाँगों को और कई चरणों को। इसी प्रकार उसके सब अंगों को गण खाने लगे। कई गण आँतें लेकर आकाश में सूर्य के मण्डल को गये। कई गण उस शव के अन्त पाने को उड़े, सो मार्ग ही में मर गये, परन्तु कहीं अन्त न पाया। देवी जो उस शव की ओर देखती थी इससे उसके नेत्रों से अग्नि निकलती थी। उस आग में मांस पकता था और गण भोजन करते थे। मांस पकने के समय जो शरीर से रक्त निकलता था, उससे मन्दराचल और हिमाचल पर्वत लाल हो गये—मानो पर्वतों ने भी लाल वस्त्र पहिने हों। रक्त की नदियाँ बहने लगीं। जो बड़े सुन्दर स्थान और दिशाएँ थीं, वे सब भयानक हो गईं। पृथ्वी के सब जीव नष्ट हो गये। पर जो पहाड़ की कन्दरा में जाकर छिप रहे थे, वे बच गये, शेष सब नष्ट हो गये। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम कहते हो कि उसके नीचे प्राणी आकर सब नष्ट हो
७१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
गये और अंग उसके ऐसे कहते हो कि ब्रह्माण्ड को भी लाँघ गये । फिर कहते हो कि देवता बच रहे, इसका क्या कारण है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उसके शरीर और अंग के नीचे आये वे तो नष्ट हो गये, पर मुख और ग्रीवा में कुछ भेद है । जिसमें जो पोल है उसमें और गोदी और टाँग के नीचे पोल में तथा सुमेरु, मन्दराचल, उदयाचल और अस्ताचल पर्वतों की कन्दराओं के पोल में बैठे हुए देवता बच गये और जो अङ्ग के छिद्रों में रहे, वे भी बच रहे और कहने लगे कि बड़ा कष्ट है जो हमारे बैठने के कई स्थान नष्ट हो गये । हाय ! वे वृक्ष कहाँ गये, हमारा बरफ का पर्वत कहाँ गया, उनकी सुन्दरता कहाँ गई, वन और बगीचे कहाँ गये, चन्दन के वृक्ष कहाँ गये और वे जनों के समूह कहाँ गये, जो हमको यज्ञ करके पूजते थे ? वे ऊँचे वृक्ष कहाँ गये, जिनके फूल और टहनी ब्रह्मलोक तक जाती थीं ? वह क्षीरसमुद्र कहाँ गया, जिसके मथने से बड़ा शब्द हुआ था ? उसके पुत्र, अर्थात् उससे उत्पन्न रत्न, कल्पवृक्ष और चन्द्रमा कहाँ गये ? जम्बूद्वीप कहाँ गया, जिसमें जम्बू के रस की नदी बहती थी और सुवर्णवत् जल के भँवर उठते थे ? ईख के रस का समुद्र कहाँ गया ? हा कष्ट ! हा कष्ट ! शक्कर और मिसरी के पर्वत और अप्सराओं के विचरने के स्थान कहाँ गये ? पृथ्वी कहाँ गई ? वे नन्दनवन के स्थान कहाँ गये, जहाँ हम अप्सराओं के साथ विहार करते थे ? उन सबका अभाव हमको शूल सा चुभता है । जैसे फल को कण्टक चुभते हैं; वैसे ही उन वस्तुओं के आभासरूपी कण्टक हमको चुभते हैं । इसी प्रकार वे अति शोकवान हुए और कहने लगे- हा कष्ट ! हा कष्ट !
इधर विषयों का स्मरण करके देवता शोक करते थे और उधर उस शव के जितने अंग थे, उनको गणों ने भोजन कर लिया और उसमे अघाये । कुछ मेदा का पिण्ड शेष रह गया था, उसमें बहुत दुर्गन्ध हुई । उस पिण्ड की पृथ्वी हो गई । जिसमें उसका नाम मेदिनी हो गया । मोटे हाड़ों के सुमेरु आदि पर्वत हुए । तब ब्रह्माजी ने देखा कि सब विश्व शून्य सा हो गया है, तब उन्होंने संकल्प किया कि अब
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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फिर मैं सृष्टि रचूँगा। निदान पहले की नाईं उन्होंने सृष्टि रची और जगत का सब व्यवहार उसी प्रकार चलने लगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्त वर्णनं-
नाम द्विशताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २२५ ॥
विपश्चित बोले, हे दशरथ ! जब यह सब हो रहा था, तब मैंने अपने इष्टदेवता से, जो तोते के वाहन पर सवार थे, प्रश्न किया कि हे महादेव ! सब जगत के ईश्वर और सब जगत के भोक्ता ! यह शव कौन था, कहाँ स्थित था और किस प्रकार गिरा ? अग्नि बोले, हे राजन् ! यह अनन्त त्रिलोकी जिसका आभास है, उससे इस शव का वृत्तान्त वर्णन हो सकता है। एक त्रिलोकी में इसका वृत्तान्त नहीं वर्णन हो सकता । हे राजन् ! एक परम आकाश है, जो चिन्मात्र पुरुष सर्वज्ञ, अनामय और अनन्त है। वह आत्मतत्त्व केवल अपने रूप में स्थित है, पर उसका जो आभास संवेदन फुरना है, वही किञ्चन होता है। वह जब किसी स्थान में फुरता है, तब ऐसी भावना होती है कि मैं तेज का अणु हूँ। उस भावना के कारण से वह चित् संवेदन अणु सा हो जाता है। जैसे कोई पुरुष सोया हो। और स्वप्न में अपने को मार्ग में चलता देखता हो, अथवा जैसे तुम स्वप्न में अपने को सोया हुआ देखो, वैसे ही चित्तसंवेदन ने अपने को अणु जाना। जैसे फुरना ब्रह्मा को हुआ है वैसे ही धूल के कण का भी अधिष्ठान में फुरना समान रूप से हुआ । जब उस अणु को शरीर की भावना होती है, तब अपने साथ शरीर देखता है। शरीर के होने से नेत्र आदि इन्द्रियाँ घनी होता हैं, तब यह शरीर अपने को और इन्द्रियों से मिला हुआ जानता है। जब अपनारूप जानकर जीव उनको ग्रहण करके इन्द्रियों से विषय को ग्रहण करता है, तब वही चिद्रूप जीव प्रमाद से आधाराधेय-भाव को मानता है। पर अधिष्ठानसत्ता में कुछ हुआ नहीं। वह अद्वैत-सत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में प्रमाद से जीव अपने को किसी गृह में बैठे देखता है, वैसे ही यहाँ प्रमाद से आधाराधेयभाव को देखता है, प्राण और मन अहंकार को धारण करता है
७१२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹
और जानता है कि मेरे माता-पिता हैं और मैं अनादि जीव हूँ। अपना शरीर जानकर आगे पाञ्चभौतिक जगत शरीर को देखता है, तब अपने फुरने के अनुसार अंग होते हैं। इसी प्रकार जो आदि शुद्ध चिन्मात्र तत्त्व में स्फुरण हुआ तो चित्तकला उपजी। उसने अपने को तेज-अणु जाना। तब उसमें अहंवृत्ति तो अहंकार हुआ, निश्चयात्मक वृत्ति बुद्धि हुई, चेतनारूप चित्त और संकल्पविकल्परूप मन हुआ। फिर तन्मात्रा उपजी, फिर इच्छा द्वारा उसके शरीर और इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। तब देखने की इच्छा हुई। उस संवित् में दृश्य भासित हुआ। तब संवित् शक्ति ने प्रमाददोष से अपने को द्वैतरूप जाना। साथ ही उसके अपने माता, पिता और कुल प्रकटे कि यह मेरी माता है, यह मेरा पिता है और यह मेरा कुल है। यह चिरकाल से चला आता है।
इसी प्रकार अहंकार सहित एक दैत्य विचरने लगा। एक कुटी में एक ऋषि बैठा था, उस कुटी की ओर गया। उसकी कुटी चूर्ण करके जब ऋषि के निकट आया, तब ऋषि ने कहा, रे दुष्ट! तूने यह क्या चेष्टा ग्रहण की है। अब तू मरकर मच्छड़ होगा। हे विपश्चित्! उस ऋषि के शापरूपी अग्नि से उसका शरीर भस्म हो गया और उसकी निराकार चेतनसंवित् भूताकाशरूप हो गई। फिर आकाश में उसका वायु से संयोग हुआ और उस मौनी ऋषि के शाप की वासना आकर उदय हुई। जैसे समय पाकर पृथ्वी में बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, वैसे ही पञ्चतन्मात्रा उदय हुई, और अपना मच्छड़ का शरीर, जिसकी आयु दो अथवा तीन दिन की होती है, अज्ञान से भासित हुआ। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो जीव जन्म पाते हैं, वे जन्म से जन्मान्तर को चले आते हैं अथवा ब्रह्मा से उपजे होते हैं--यह कहो? वशिष्ठजी बोले, हे राम! कई जन्म से जन्मान्तर को चले आते हैं और कई ब्रह्मा में उपजे होते हैं। जिनको पूर्ववासना का संस्मरण होता है, वे वासना के अनुसार शरीर पाते हैं और जन्म से जन्मान्तर पाते चले आते हैं। और जिनको संस्कार बिना भूत भासित होते हैं, वे ब्रह्मा से उत्पन्न होते हैं। हे राम! आदि में सब जीव संस्काररूपी कारण बिना उत्पन्न
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७१३
हुए हैं। पीछे जन्मान्तर होता है। जो संस्कार बिना भूत भासित हो, उसे जानिये कि ब्रह्मा से उपजा है। और जिसको संस्कार से सृष्टि भासित हो; उसे जानिये कि इसका जन्मान्तर है। यह दो प्रकार से भूतों की उत्पत्ति मैंने तुमसे कही है। अब फिर उस मच्छर का क्रम सुनो।
हे राम ! जब उसने मच्छर का जन्म पाया, तब कमलिनियों में और हरी घास, तृण और पत्तों में मच्छड़ों को साथ लिये रहने लगा। निदान वहाँ एक मृग आया और उसका पैर उस मच्छर पर इस प्रकार पड़ा, जैसे किसी पर सुमेरु पर्वत आ पड़े। तब वह मच्छर चूर्ण होकर मृतक हो गया। मृतक होने के समय मृग की ओर देखने लगा, इससे मरकर तत्काल ही मृग हुआ और वन में विचरने लगा। फिर एक काल में उसको वधिक ने देखकर बाण चलाया। उस बाण से वह मृग विंध गया। विंधे हुए घायल मृग ने वधिक की ओर देखा, इसलिए वह मरकर वधिक हुआ और धनुष बाण लेकर मृग और पक्षियों को मारने लगा। एक समय वह वन को गया। वहाँ एक मुनीश्वर को देख उनके निकट जा बैठा। तब मुनीश्वर ने कहा, भाई ! तूने यह क्या पापचेष्टा आरम्भ की है ? इस चेष्टा से तू नरक को जायगा। इससे किसी जीव को दुःख न दे। जिन भोगों के लिए तू यह चेष्टा करता है, वे बिजली की चमक जैसे क्षणिक हैं। जैसे मेघ में बिजली की चमक होती है और फिर मिट जाती है, वैसे ही ये भोग भी होकर मिट जाते हैं। जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद ठहरती है, पर उसकी आयु कुछ नहीं होती, क्षण भर में वह गिर पड़ती है, वैसे ही इस शरीर की आयु कुछ नहीं है। जैसे अञ्जलि में डाला जल नहीं ठहरता, वैसे ही जवानी चली जाती है। यौवन क्षणभंगुर और असार है। उसमें भोगना क्या है ? इनसे कभी शान्ति नहीं होती। जो तुझको शान्ति की इच्छा हो तो निर्वाण होने का प्रयत्न कर। तब तू दुःख से मुक्त होगा। अपने हिंसाकर्म को त्याग दे। इसके करने से नरक में जायगा और कभी तुझको शान्ति न प्राप्त होगी। तू अपने हाथ से अपने पैर पर क्यों कुल्हाड़ी मारता है, अपने नाश के लिए क्यों विष-बीज बोता
७१४ योगवाशिष्ठ
है? इस कर्म से तू दुःखरूप संसार में भटकता फिरेगा और शान्ति कभी न होगी। इससे अब तू वही उपाय कर, जिससे संसारसमुद्र के पार हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्गलाव्याधवर्णनन्नाम द्विशताधिकषड्विंशतितमसर्गः॥ २२६ ॥
अग्नि बोले, हे राजन्! ऋषीश्वर ने जब इस प्रकार उस वधिक से कहा, तब उसने धनुषबाण डाल दिया और बोला, हे भगवन्! जिस प्रकार में संसारसमुद्र के पार हो जाऊँ, वह उपाय कृपा करके मुझसे कहिये। परन्तु वह उपाय दुःसाध्य न हो और न मृदु हो अर्थात् जो अल्प भी न हो और कठिन भी न हो। ऋषीश्वर बोले, हे वधिक! मन को एकाग्र करने का नाम शम है। इन्द्रियों के रोकने को दम कहते हैं—वही मौन है। मन को एकाग्र करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण की शुद्धता से आत्मज्ञान उपजता है। इससे संसारभ्रम निवृत्त होकर परमानन्द की प्राप्ति होती है। अग्नि बोले, हे राजन्! इस प्रकार जब ऋषीश्वर ने कहा, तब वह वधिक उठ खड़ा हुआ और प्रणाम करके तप करने लगा। इन्द्रियों को उसने संयम में रखा और जो अनिच्छित यथाशास्त्र प्राप्त होता उसका भोजन करने लगा। हृदय में सब क्रियाओं की मौनवृत्ति धारण की। जब उसको कुछ काल तप करते व्यतीत हुआ, तब उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ। वह ऋषीश्वर के निकट आ प्रणाम करके बैठ गया और बोला, हे भगवन्! बाहर जो दृश्य है, वह हृदय में किस प्रकार प्रवेश करता है और स्वप्न में अन्तर की सृष्टि बाह्यरूप हो कैसे दिखती है? यह कृपा करके कहो।
ऋषीश्वर बोले, हे वधिक! तूने यह बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। यही प्रश्न मैंने भी गणपति से किया था और उनके कहने से मैंने जो जाना है, सो सुन। एक समय यही सन्देह दूर करने का उपाय मैंने भी किया था। पद्मासन बाँध, बाहर की इन्द्रियों को रोक मन में लगाया और मन, बुद्धि आदि को पुर्यष्टका में स्थित किया। फिर पुर्यष्टका को भी शरीर में विरक्त किया, और उसे आकाश में निराधार ठहराया। निदान
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७१५
जब विलक्षण होना चाहता, तब विलक्षण हो जाता और जब शरीर में व्यापा चाहूँ, तब व्याप जाता । हे वधिक ! इस प्रकार जब मैं योग-धारणा से पूर्ण हुआ, तो एक समय मैंने देखा एक पुरुष मेरी कुटी के पास सो रहा था और उसकी स्वाँस भीतर-बाहर आती-जाती थी । उसको देखकर मैंने यह इच्छा की कि इसके भीतर जाकर कौतुक देखूँ कि क्या अवस्था होती है । ऐसे विचार कर मैंने पद्मासन बाँधा और योग की धारणा करके उसके श्वासमार्ग से भीतर प्रवेश किया । जैसे ऊँट ऊँघता हो और उसके श्वासमार्ग से भीतर सर्प प्रवेश करे, वैसे ही मैंने प्रवेश किया । उसके भीतर अपने-अपने रस को ग्रहण करनेवाली नाड़ियाँ मुझे देख पड़ीं । कई वीर्य को ग्रहण करनेवाली हैं, कई रक्त और कफ को ग्रहण करती हैं, कई मलमूत्रवाली हैं । अनेक विकार जो उसके भीतर थे, सो सब देखे । इससे मैं अप्रसन्न हुआ कि यह तो महा अपवित्र स्थान है । यहाँ रक्तमज्जा से युक्त महानरक के तुल्य अन्धकार है । फिर और आगे गया तो वहाँ एक कमल देखा, जिसमें उसका संवेदन फुरता था और संवित्शक्ति, जो महातेज युक्त हृदयाकाश है, वह भी वहाँ स्थित था । वही त्रिलोकी का आदर्श है, त्रिलोकी में जो पदार्थ हैं, उनका दीपक है और सब पदार्थों की सत्ता है । ऐसी संवित्-रूपी जीवसत्ता वहाँ स्थित थी । उसमें तद्रूपता को प्राप्त हुआ । फिर मैंने सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, समुद्र, देवता, गन्धर्व आदि नाना प्रकार के स्थावर-जङ्गम विश्व को देखा । ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सहित सम्पूर्ण सृष्टि को उसके भीतर देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि उसके भीतर सृष्टि क्योंकर भासित हुई ।
हे वधिक ! उसने जाग्रत् में उस सृष्टि का अनुभव इन्द्रियों से किया था और भीतर चित्तत्त्व में उसका संस्कार हुआ था । वही भीतर भासने लगा । भीतर जो भूतसत्ता थी, वह उसके स्वप्न में बाहर सृष्टिरूप बनी और मुझको प्रत्यक्ष भासित होने लगी । जैसे जाग्रत् प्रत्यक्ष अर्थाकार भासता है, वैसे ही मुझको यह सृष्टि भासित होने लगी । हे वधिक ! इस जाग्रत् सृष्टि और उस सृष्टि में मैंने कुछ भेद न देखा—दोनों तुल्य
७१६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
है । निरपर्यन्त प्रतीत का नाम जाग्रत् है और अल्पकाल की प्रतीत का नाम स्वप्न है । पर स्वरूप में दोनों तुल्य हैं । जो उसके स्वप्न के अनुभव में था, वह मुझको जाग्रत् दिखा और जो मुझको जाग्रत् दिखा, वह उसको स्वप्न दिखा । निद्रादोष से उसको स्वप्न हुआ, सो उसकी भी उस काल में जाग्रतरूप भासित होने लगा, क्योंकि स्वप्न जो स्वप्नरूप है, सो जाग्रत् में स्वप्न है, और स्वप्न में तो जाग्रत् है । वैसे जाग्रत् भी अपने काल में जाग्रत् है, नहीं तो स्वप्नरूप है । इसलिए जाग्रत् में भी जो सत्य की प्रतीत है; वही प्रमाद है । इन दोनों में कुछ भेद नहीं, क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न दोनों का अधिष्ठान चैतन्यसत्ता परब्रह्म ही है और उसी के प्रमाद से प्राण के साथ सम्बन्ध हुआ है । जब प्राण से चित्तसंवेदन मिलता है, तब उस स्फुरण रूप के जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार आदि नाम होते हैं । वही संवेदन, जो वाह्यरूप हो फुरता है, तब जाग्रतरूप जगत् होकर भासित होता है । और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्म-इन्द्रियाँ और अन्तःकरण चतुष्टय ये चौदह अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं-उसका नाम जाग्रत है । जब चित्तस्पन्द निद्रादोष में अन्तर्मुख फुरता है, तब नाना प्रकार की स्वप्न की सृष्टि देखता है और उस काल में वही जाग्रतरूप भासित होता है । अधिष्ठान आत्मसत्ता जब संवेदन उसकी ओर फुरती है और बाह्यविषय के स्फुरन से रहित होती है, तब न जाग्रत् भासित होती है और न स्वप्न भासित होता है, केवल निर्विकल्प आत्मसत्ता शेष रहती है ।
हे वधिक ! मैंने विचारकर देखा है कि जगत् और कुछ वस्तु नहीं, फुरने ही का नाम जगत् है । जब चित्तसंवेदन स्फुरणरूप होता है, तब जगत् भासता है और जब चित्तसंवेदन फुरने से रहित होती है, तब जगत् की कल्पना मिट जाती है । इसलिए मैंने निश्चय किया है कि वास्तव में केवल चिन्मात्र है । जगत् कुछ वस्तु नहीं, मिथ्या कल्पनामात्र है । हे वधिक ! जगत्-भावना त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो ।
अब वही वृत्तान्त फिर सुनो । जब उसके भीतर मैंने स्वप्न और
❉ निर्वाण प्रकरण ❉
७१७
जाग्रत् अवस्था देखी, तब मैंने यह इच्छा की कि सुषुप्ति अवस्था भी देखूँ। और विचार किया कि सुषुप्ति प्रलय का नाम है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, तीनों का अभाव हो जाता है। परन्तु जहाँ मैं देखनेवाला हुआ, वहाँ महाप्रलय कैसे होगा और जो मैं जाननेवाला न होऊँ तब सुषुप्ति को कौन जानेगा? हे वधिक! तब मैंने विचारकर देखा कि सुषुप्ति और कुछ नहीं। जहाँ चित्त की वृत्ति नहीं फुरती उसी का नाम सुषुप्ति है। ऐसे विचारकर मैंने चित्त को फुरने से रहित किया, तब उसकी सुषुप्ति देखा तो क्या देखा कि न कोई वहाँ अहं और त्वं शब्द है, न शुभ है, न अशुभ है, न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति की कल्पना है। सब कल्पना से रहित केवल चित्तसत्ता मैंने देखी। जो तुम कहो कि तुमने सुषुप्ति निर्विकल्प कैसे देखी तो उसका उत्तर यह है कि अनुभव ज्ञानरूप आत्मसत्ता सर्वदा ज्यों की त्यों है। उसमें जैसा आभास फुरता है वैसा ही ज्ञान होता है। यह जो तुम भी दिन प्रतिदिन देखते हो और सुषुप्ति से उठकर जानते हो कि मैं सुख में सोया था, सो अनुभव से ही देखते हो। वैसे ही मैंने भी वह देखा, जहाँ चित्तसंकल्प कोई नहीं फुरता, केवल निर्विकल्प है, परन्तु सम्यग्बोध से रहित है। उसी अभाव वृत्ति का नाम सुषुप्ति है। फिर मुझको तुरीयावस्था देखने की इच्छा हुई। पर तुरीयावस्था देखना महा-कठिन है।
तुरीयावस्था साक्षीभूत वृत्ति का नाम है। वह सम्यग्ज्ञान से उत्पन्न होती है। वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था की साक्षी और सुषुप्ति की नाईं है। जैसे सुषुप्ति में अहं त्वं आदि कोई कल्पना नहीं होती, वैसे ही तुरीयावस्था में भी नहीं। उसमें ब्रह्म का सम्यग्बोध होता है, पर सुषुप्ति जड़ीभूत नामरूप अविद्या होती है। तुरीयावस्था में जड़ता नहीं होती, सुषुप्ति और तुरीयावस्था में इतना ही भेद होता है। सच्चिदानन्दसाक्षी वृत्ति होती है। सम्यग्बोध का नाम तुरीयपद है। तुरीय इससे भिन्न नहीं। ऐसे निश्चय से मैंने इसको देखा। हे वधिक! चारों अवस्था मैंने माया अर्थात् स्फुरण सहित भिन्न-भिन्न देखीं, पर आत्मसत्ता अपने
७२८ ✻ योगवासिष्ठ ✻
आपमें स्थित है। उसमें न कोई जाग्रत है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है और न तुरीयावस्था है—इनका भेद वहाँ नहीं है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत है, और ये चारों अवस्थाएँ चित्त संवेदन में होती हैं। हे बंधिक ! ऐसा अनुभव करके में बाहर आया। बाहर भी मुझको वैसे ही दिखने लगा तब मैंने कहा कि यह जगत् मुझको उसके भीतर दिखा था, वह बाहर कैसे आया ? तब मैंने फिर उसके भीतर प्रवेश किया। प्रथम जब उसके भीतर मैंने प्रवेश किया था और उसके भीतर सृष्टि देखी थी, तब उसका और मेरा संवेदन मिल गया था, पर जब मैंने अपना संवेदन उससे भिन्न किया, तब दो ब्रह्माण्ड हो गये। एक उसका संवेदन फुरने में और एक मेरे संवेदन में भासित होने लगा, क्योंकि मैंने प्रथम उसकी सृष्टि को देख और अर्थरूप जानकर ग्रहण किया था। उसका संस्कार दृढ़ हो गया। आत्मसत्ता के आश्रय से जैसे संवेदन फुरता गया वैसे ही होकर भासित होने लगा। उसका स्वप्न मुझको जाग्रत होकर भासित होने लगा—जैसे एक दर्पण में दो प्रतिबिम्ब दिखें, वैसे ही एक अनुभव में मुझको दो सृष्टि दीखने लगीं। तब मैंने विचार किया कि सृष्टि संकल्परूप है। संकल्प प्रत्येक जीव का अपना-अपना है और अपने-अपने संकल्प की भिन्न-भिन्न सृष्टि है, इससे अनुभव के आश्रय से जैसा-जैसा संकल्प फुरता है वैसी-वैसी सृष्टि दिखती है। सृष्टि का कारण और कोई नहीं।
हे बाधिक ! आठ निमेष तक मुझको दो सृष्टि दिखती रहीं। फिर मैंने उसके और अपने चित्त की वृत्ति इकट्ठी करके मिलाई तो दोनों सदृश हो गईं—जैसे जल और दूध मिलकर एकरूप हो जाते हैं। तब दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया। जैसे दृष्टि भ्रम से आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं और भ्रम के न रहने पर दूसरा चन्द्रमा का अभाव हो जाता है, वैसे ही द्वितीय वृत्ति के अभाव में दूसरी सृष्टि का अभाव हो गया। निदान एक ही सृष्टि दिखने लगी, नाना प्रकार के व्यवहार होते दिखे और चन्द्रमा, सूर्य, पृथ्वी, द्वीप, समुद्र स्पष्ट भासित होने लगे। कुछ काल के उपरान्त चित्त की वृत्ति सुषुप्ति की ओर आई
⁂ निर्वाण प्रकरण ⁂ ७१९
और स्वप्न की सृष्टि का विस्तार लीन होने लगा—जैसे सन्ध्या के समय सूर्य की किरणें सूर्य में लय हो जाती हैं। जब वह सृष्टि चित्त में लय होने लगी, तब स्वप्न की सृष्टि मिट गई; सुषुप्ति अवस्था हुई और सब इन्द्रियाँ स्थिर हो गईं। हे वधिक ! सुषुप्ति तब होती है, जब जीव अन्न भोजन करता है और वह संवाही नाड़ी पर आकर स्थित होता है तब जाग्रत्वाली नाड़ी ठहर जाती है, उसमे प्राण भी ठहर जाते हैं। तब मन भी ठहर जाता है। उसका नाम सुषुप्ति है। जब मन फिर फुरता है, तब जाग्रत्अवस्था होती है। इतना सुन राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब मन प्राणों ही से चलता है, तब मन का अपना रूप तो नहीं हुआ ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थ से कहिये तो देह ही नहीं है, तो मन क्या हो ? जैसे स्वप्न में पहाड़ दिखते हैं, वैसे ही यह शरीर दिखता है, क्योंकि सबका आदिकारण कोई नहीं; इससे जगत् मिथ्याभ्रम है—केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है। जो तत्त्ववेत्ता हैं, उनको तो ऐसे ही भासित होता है। अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते हैं। जैसे सूर्य उलूक के अनुभव को नहीं जानता और उलूक सूर्य के निश्चय को नहीं जानता, वैसे ही ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय भिन्न-भिन्न होता है। शुद्ध चिन्मात्र आकाश में जगत्-भ्रम कुछ नहीं है, पर स्फुरणभाव से जीव अपने चेतन वपु को भूल, ज्ञान बिना ही मनभाव को प्राप्त होता है और तब मन आत्मसत्ता के आश्रित होकर प्राणवायु को अपना आश्रय कल्पना करता है कि यह मेरा प्राण हे। हे राम ! फिर जैसे-जैसे मन कल्पना करता है, वैसे-वैसे देह, इन्द्रियाँ और जगत् दिखते हैं। परब्रह्म सर्वशक्तिसम्पन्न है। उसमें जैसी-जैसी भावना से मन फुरता है, वैसा ही वैसा रूप भासित होता है। वास्तव में और कुछ नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है। मन का फुरना जैसे-जैसे दृढ़ हुआ है, वैसे ही वैसे देह, इन्द्रियाँ और जगत् भासित होने लगा है। जैसे स्वप्न में कल्पनामात्र जगत् दिखता है, वैसे ही इसे जानो। हे राम ! जितने विकल्प उठते हैं, वे सब मन के रचे हुए हैं। जब मन उदय होता है, तब वह स्फुरण होता
७२० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है कि यह पदार्थ सत्य है और यह असत्य है । जब चित्तशक्ति का मन से सम्बन्ध होता है, तब प्रथम प्राण उदय होते हैं और प्राण का ग्रहण करके मन कहता है कि मैं जीव हूँ; प्राण ही मेरी गति है, प्राण के बिना में कहाँ था ? फिर कहता है कि जब प्राण का वियोग होगा, तब में मर जाऊँगा, फिर न रहूँगा । फिर ऐसे कहता है कि मरकर भी में जिऊँगा । हे राम ! संशयवाले को न इस लोक में सुख है और न परलोक में । जब तक आत्मबोध का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक चित्त भी निर्वाण नहीं होता और विकल्प भी नहीं मिटते ।
हे राम ! मन के विस्मरण का उपाय आत्मज्ञान के सिवा कोई नहीं है और मन के शान्त हुए बिना कल्याण भी नहीं होता । दो उपायों से मन शान्त होता है । मन की वृत्ति स्थित करने और प्राण- स्पन्द के रोकने से मन स्थिर होता है, तब प्राण रुक जाते हैं । और प्राण के स्पन्दन को रोकने से भी मन स्थिर होता है । जब प्राण क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब चित्त में भी क्षोभ होता है और तभी जीव अध्या- त्मिक और आधिभौतिक तापों की अग्नि से जलता है । मन को स्थिर करने से परमसुख प्राप्त होता है । इस मन की स्थिति दो प्रकार की है—एक ज्ञान की स्थिति, दूसरी अज्ञान की स्थिति । जब प्राणी बहुत अन्न भोजन करता है, तब वह नाड़ी पर जाकर स्थित होता है और प्राण ठहर जाता है । जब प्राण ठहरता है, तब मन भी जड़ीभूत हो जाता है, उसी का नाम सुषुप्ति है । वे नाड़ी कौन हैं, जिन पर अन्न जाकर स्थित होता है ? वे नाड़ी वे ही हैं, जिनके मार्ग से जाग्रत् में प्राण निकलते हैं । जब वासना के साथ वे ही नाड़ी रोकी जाती हैं, तब मन सुषुप्ति हो जाता है । यह अज्ञानी के मन की स्थिति है, क्योंकि उसमें जड़ता है, अतएव वह संसार के लिये शीघ्र ही फिर उठ आता है । जैसे पृथ्वी में बीज समय पाकर अंकुरित होता है, वैसे ही वह संस्कार-वश फिर सुषुप्ति से उठता है । जो ज्ञानवान् सम्यग्दर्शी है, उसका चित्त चेतनता के लिए स्थिर होता है । वह चेतनता दो प्रकार की है—एक तो योगी की होती है, जिसमें वह समाधि में मन को
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<div align="right">७२१</div>स्थिर करता है वह समाधिनिष्ठ चित्त है; जड़ता नहीं । जैसी सुषुप्ति में जड़ता होती है, वैसी जड़ता वह नहीं है । दूसरे, ज्ञानवान् जीवन्मुक्त के चित्त की वृत्ति सम्यक्ज्ञान से स्थिर होती है, क्योंकि उसका चित्त वासना से रहित है । यही स्थिति है । जिसका चित्त इस प्रकार स्थिर है, उसी पुरुष को शान्ति होती है, और जिसका चित्त वासना सहित है उसको कभी शान्ति नहीं प्राप्त होती । उसके दुःख भी नहीं मिटते । इसका चित्त निर्वासनिक करने को सम्यक्ज्ञान का कारण यह मेरा शास्त्र ही है । इसके समान और कोई उपाय नहीं । हे राम ! यह जो मोक्ष का उपाय शास्त्र मैंने कहा है, उसके विचार से शीघ्र ही स्वरूप की प्राप्ति होगी । इससे सर्वदा इसी का विचार करना चाहिए । जब इसको भली प्रकार विचारोगे, तब चित्त निर्वासनिक हो जायगा ।
अब वही वधिक का प्रसंग सुनो । मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! जब मैंने उस पुरुष के चित्त में प्राणमार्ग से प्रवेश किया, तब देखा, उसके प्राण रोके गये हैं और अन्न से जो जाग्रत् नाड़ी फुरती थी, वह भी रोकी गई है, क्योंकि अन्न पचा न था, इस कारण वह सुषुप्ति में था । उसकी सुषुप्ति में मुझको भी अपना आपा भूल गया । जब कुछ अन्न पचा, तब उसके प्राण जागने लगे और जब प्राण जागने लगे तब चित्त की वृत्ति ने भी कुछ जड़ता को त्यागा । पर सम्पूर्ण जड़ता नहीं गई । प्राण के जगने में चन्द्रमा, सूर्य आदि जो कुछ विश्व है, वह भी जगा । तब मैंने नाना प्रकार के जगत् को देखा और मुझे अपना पूर्वसंस्कार भूल गया । निदान वहाँ मैं भी अपने कुटुम्ब में रहने लगा । साथ ही मुझे अपनी कुटी दिखी और स्त्री, पुत्र, भाई, जन, बान्धव सब दिखे । फिर मेरे देखते-देखते प्रलयकाल के पुष्कर मेघ गर्जने लगे, मूसलधार जल बरसने लगा और सातों समुद्र उमड़ने लगे । निदान जो कुछ प्रलयकाल के उपद्रव होते हैं, वे सब प्रकट हुए । प्रथम अग्नि लगी । जब अग्नि लग चुकी और सब स्थान जल गये, तब जल का उपद्रव प्रकट हुआ । तब मैंने क्या देखा, कि नगर, ग्राम, पुर, मनुष्य, पशु, पक्षी सब बहते जाते हैं । हाहाकार शब्द के साथ बड़ा क्षोभ हुआ । मैंने
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और एक आश्चर्य देखा कि मेरी कुटी भी बही जा रही है. मेरे स्त्री, पुत्र, भाई, जन इत्यादि भी सब जल के प्रवाह में बहे जा रहे हैं। जिस स्थान में हम थे, वह स्थान भी बहा जा रहा था और मैं भी लुढ़कता जाता था। निदान बहते-बहते मुझको ऐसा कष्ट हुआ कि कहा नहीं जा सकता। एक तरङ्ग से तो मैं ऊपर को चला जाता और एक तरङ्ग के साथ नीचे चला जाता। तब मुझे अपना पूर्व शरीर याद आ गया। जितना कुछ जगत् है वह मुझको सब दिखने लगा। तब मिथ्या रागद्वेष मिट गया और शरीर की सब चेष्टा उसी प्रकार होने लगी। तरङ्ग के साथ कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता था। परन्तु मेरा हृदय शान्त हो गया। उस समय नगर, देश और मण्डल बहते जा रहे थे। त्रिनेत्र सदाशिव और विद्याधर, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, सिद्ध आदि सब बहते जा रहे थे। अष्टदल कमल की पंखड़ी पर बैठे ब्रह्माजी और इन्द्र, कुबेर और विष्णु भी अपनी-अपनी पुरियों सहित बहते जा रहे थे। पहाड़, द्वीप, लोकपाल भी बहते जा रहे थे। सब पातालवासी प्रलय के जल में बहते जा रहे थे। यम भी अपने वाहन सहित बहते जा रहे थे। किसी में ऐसी सामर्थ्य न था कि किसी को कोई निकाले, क्योंकि आप ही सब बहते जा रहे थे और डूबते और गोते खाते थे। बड़े ऐश्वर्यवाले देवता भी बहे जा रहे थे। जो संसार-सुख के लिए यत्न करते हैं, वे महामूर्ख हैं। लोग जिसके लिए यत्न करते हैं, वे सुख और दुःख के देनेवाले सब बहते जा रहे थे। वैसे ही सब ऋषीश्वर भी बहते जा रहे थे। हे वधिक! मैंने इस प्रकार एक स्वप्न में महाप्रलय होता देखा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हृद्यान्तरस्वप्नमहाप्रलयवर्णनं-नाम द्विशताधिकसप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २२७ ॥
वधिक ने पूछा, हे मुनीश्वर! यह महाप्रलय तुमने कहा कि उसमें ब्रह्मादिक भी बहते जा रहे थे। परन्तु ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक तो स्वतंत्र ईश्वर हैं, वे परतन्त्र हुए बहते जाते तुमने कैसे देखे? वे अन्तर्धान क्यों न हुए? मुनीश्वर बोले, हे वधिक! यह जो प्रलय हुआ सो क्रम
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से नहीं हुआ। जब क्रम से प्रलय होता है, तब ये ईश्वर समाधि से शरीर को अन्तर्धान कर लेते हैं। परन्तु यहाँ तो अन्तर्धान होने से पहले जल चढ़ गया। इसका कुछ नियम नहीं; क्योंकि यह जगत् भ्रमरूप है। इसमें क्या आस्था करना है। स्वप्न में क्या नहीं बनता और स्वप्नभ्रान्ति से विपर्यय भी होते हैं, इसलिए उनको बहते देखा। व्याध ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब वह स्वप्न भ्रम था तो उसका वर्णन क्यों किया ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक, तुझमें इस समानता का अर्थ कहता हूँ। मैं कह चुका हूँ कि स्थावर जङ्गम जगत् बहता देखा और साथ ही में भी बहता जाता था, जल की लहरें उछलती थीं और उन तरङ्गों में में भी उछलता था, परन्तु मुझको कुछ कष्ट न होता था। निदान में बहता बहता एक किनारे पर जा लगा। उसके पास एक पर्वत था, उसकी कन्दरा में पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि जीव बहते हैं और जल भी सूखता जाता है। जल के सूखने से कीचड़ हो गई। किसी जगह जल रहा, उसमें कोई डूबते दिखते थे। कहीं ब्रह्मा के हंस, कहीं यम के वाहन और कहीं विष्णु के वाहन कीचड़ में पहाड़ की नाईं डूबते देख पड़ते थे। कहीं इन्द्र के हाथी और विद्याधर आदि वाहन कीचड़ में धँसे देख पड़े। देवता, सिद्ध, गन्धर्व, लोकपाल भी देखे। इससे मुझे आश्चर्य हुआ।
हे वधिक ! इस प्रकार देखता हुआ जब मैं पहाड़ की कन्दरा में सो गया, तब मुझको अपनी संवित् में स्वप्न आया। उसमें मैंने चन्द्रमा, सूर्य आदि नाना प्रकार के भूत जलते देखे, नगर और पर्वत जलते देखे और जगत् बड़े खेद को प्राप्त हुआ देखा। जब रात्रि हुई तो वहाँ सोया हुआ स्वप्न को देखता रहा। दूसरे दिन फिर मैंने उसमें जगत् देखा। सूर्य, चन्द्रमा, देश, नदियाँ, समुद्र, मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी नाना प्रकार की क्रियाएँ करते देख पड़ने लगे। मैंने अपना सोलह वर्ष का शरीर देखा। मुझे अपने पिता और माता देख पड़े। उनको देख मैंने पिता और माता जाना और उन्होंने मुझको अपना पुत्र जाना। निदान स्त्री, कुटुम्ब, बान्धव समस्त मुझको देख पड़े। मैं बोध में रहित और तृष्णा सहित था, इससे मुझमें अहं-मम का अभिमान
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जगा । मैंने एक ग्राम में, जहाँ मेरा गृह था, ईंट और काष्ठ संग्रह करके एक कुटी बनाई । उसके बाहर बेल बूट लगाकर एक आसन बनाया, जहाँ कमण्डलु और माला पड़ी थीं । मैं ब्राह्मण था, मुझको धन कमाने की इच्छा हुई । और जो कुछ ब्राह्मण का आचार व चेष्टा थी, वह भी मैं करता था । बाहर जाकर ईंट और काष्ठ ले आता और आकर कुटी बनाता था । यह चेष्टा मेरी होने लगी । शिष्य और सेवक मेरी पूजा करने लगे । मैं यथायोग्य उनको आशीर्वाद देता था । इस प्रकार गृहस्थाश्रम में मैं चेष्टा करने लगा । मेरे मन में यह विचार उपजा कि यह कर्तव्य है, इसके करने से भला होता है । नदियों और तालाबों में मैं स्नान करता, गौ की टहल करता और अतिथि की पूजा करता था । हे वधिक ! इस प्रकार चेष्टा करता में सौ वर्ष तक वहाँ रहा । तब एक समय मेरे घर में एक मुनीश्वर आये । मैंने प्रथम उनको स्नान कराया, फिर भोजन से तृप्त किया और रात्रि के समय शय्या पर शयन कराया । इस प्रकार उनकी सेवा कर रात्रि को हम वार्ता-चर्चा करने लगे । उसमें उन्होंने मुझको बड़े पर्वत, कन्दरा और चित्त के मोहनेवाले सुन्दर देश, स्थानों के विषय में नाना प्रकार के संवाद सुनाये । वह कहने लगे कि हे ब्राह्मण ! जितने सुन्दर स्थानों का हाल और समाचार तुमको सुनाये हैं, उन सबमें सार एक चिन्मात्ररूप है । इससे सब चिन्मात्र स्वरूप है । सब जगत् उसका चमत्कार और आभास (किञ्चित्) है । उससे कोई वस्तु भिन्न नहीं । इससे हे ब्राह्मण ! उसी सत्ता को ग्रहण करो, जो सबका अनुभव और परमानन्दस्वरूप है । उसी में स्थित हो जाओ ।
हे वधिक ! उन मुनीश्वर ने जब इस प्रकार मुझसे कहा, तब पहले ही से मेरा मन योग में निर्मल होने के कारण उनके वचन मेरे चित्त में चुभ गये और मैं अपनी स्वभावसत्ता में जाग उठा । तब मैंने देखा कि सब मेरा संकल्प है, मुझसे भिन्न कोई नहीं; मैं तो मुनीश्वर हूँ और यह स्वप्न आया था । मैंने जागकर देखा कि यह उसी पुरुष का स्वप्न था । तब मेरे मन में आया कि किसी प्रकार इसके चित्त से बाहर
⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙
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निक्लूँ और अपने शरीर में प्रवेश करूँ। मैंने फिर विचारा कि यह जगत् तो उस पुरुष का शरीर है। वही पुरुष विराट् है, जिसके स्वप्न में यह जगत् है। परन्तु उस पुरुष को अपने विराट्स्वरूप का प्रमाद है. इससे जैसा हमारा शरीर बना है, उसके स्वप्न में वह भी वैसा एक दूसरा विराट् बन पड़ा है। तो फिर उस विराट् का कैसे जानिये कि उसके चित्त से निकला जाय । हे वधिक ! इस प्रकार विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और योग की धारणा कर उसे विराट्स्वरूप के शरीर को देखा । फिर जहाँ चित्त की वृत्ति जगती थी, उसके साथ मिलकर और प्राण के मार्ग से निकलकर मैंने अपनी कुटी की और उसमें अपने शरीर को पद्मासन लगाये देखा । तब मैंने उसमें प्रवेश करके नेत्र खोले तो अपने सामने शिष्य बैठे देखे । वह पुरुष सोया था. उसको भी देखा । एक मुहूर्त बीता, तब मुझे आश्चर्य हुआ कि भ्रम में क्या-क्या चेष्टा देख पड़ती है। यहाँ एक मुहूर्त बीता है और वहाँ मैंने सौ वर्ष का अनुभव किया । बड़ा आश्चर्य है कि भ्रम से क्यों नहीं होता । फिर मेरे मन में आया कि उसके चित्त में प्रवेश करके कुछ और कौतुक भी देखूँ । तब प्राण के मार्ग से उसके चित्त में मैंने फिर प्रवेश किया तो देखा. अगली कल्पना बीत गई; बान्धव, पुत्र, स्त्री, माता, पिता आदि सब नष्ट हो गये हैं और दूसरा कल्पना आ गया है। उसका भी प्रलय होता है बारह सूर्य उदय होकर विश्व जलाने लगे हैं। बड़वाग्नि जलने लगी है। मन्दराचल और अस्ताचल पर्वत जलकर टूक-टूक हो गये हैं। पृथ्वी जर्जर हो गई है। स्थावर-जङ्गम जीव हाहाकार कर रहे हैं। बिजली चमकती है। तब बड़ा क्षोभ हुआ। हे वधिक ! मैं अग्नि में जा पड़ा। मेरा शरीर भी जलने लगा। परन्तु मुझको कुछ कष्ट न हुआ। जैसे किसी पुरुष को अपने स्वप्न में कष्ट प्राप्त हो और जब जाग उठे तो कुछ कष्ट नहीं होता, वैसे ही अग्नि का कष्ट मुझको कुछ न हुआ। मैं अपने को वही जाग्रतवाला रूप जानता था। जगत्-प्रलय को भ्रममात्र जानता था। इस कारण मुझको कष्ट न होता था। चेष्टा तो में भी उसी प्रकार देखता और करता था,
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परन्तु हृदय से ज्यों का त्यों शान्त चित्त था। और लोग अग्नि के क्षोभ से कष्ट पाते थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हृदयान्तर प्रलयाग्निकदाहवर्णनं नाम द्विशताधिकाष्टविंशतितमसर्गः ॥ २२८ ॥
मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! प्रलय के क्षोभ में मैं भी भटकता था और जल में बहता था, परन्तु पूर्व का शरीर मुझको विस्मरण न हुआ, इस कारण शरीर का दुःख मुझको स्पर्श न करता था। मैंने विचार कि यह जगत् तो मिथ्या है, इसमें विचरने से मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? यह तो स्वप्नमात्र है। इसमें में किस निमित्त खेद पाऊँ—इसमें जगत् से बाहर निकलूँ। वधिक ने पूछा, हे मुनीश्वर ! तुमने जो उस स्वप्न में जगत् को देखा, वह जगत् क्या वस्तु था और स्वप्न क्या था ? उसकी संविद् में जगत् था और उस जगत् का उसको ज्ञान था वह प्रमादी था ? तुमने तो जाग्रत् होकर उसका स्वप्न देखा था, उसके हृदय में पहाड़ कहाँ से आया और नदियाँ वृक्ष आदि नाना प्रकार के भूत-जाति और पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि आदि विश्व की रचना कहाँ से आई ? वह सब क्या था ? यह मेरा संशय दूर करो। जो तुम कहो कि अपने स्वप्न में तुम भी अपनी सृष्टि देखते हो तो हे भगवन् ! हमको जो स्वप्न देख पड़ता है, उसे हम अपने स्वरूप के प्रमाद से देखते हैं। पर तुमने जाग्रत् होकर देखा, तो कैसे देखा ? मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! प्रथम जो मैंने देखा था, वह अपने को भूलकर उसके हृदय में जगत् देखा था। और दूसरी बार जो देखा, वह अपने को जानकर जगत् देखा था। वह क्या वस्तु है सुनो। हे वधिक ! जो वस्तु कारण से होती है, वह सत्य होती है और जो कारण बिना दिखती है, वह मिथ्या होती है। मुझको जो सृष्टि उसके स्वप्न में दिखी थी, वह कारण बिना थी; क्योंकि कारण दो प्रकार का होता है—एक निमित्त कारण; जैसे घट का कारण कुम्हार होता है और दूसरा समवाय कारण; जैसे घट मृत्तिका का होता है। जो दोनों प्रकार से उत्पन्न करे वह कारण कहलाता है। पर आत्मा तो दोनों प्रकार से जगत् का कारण
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नहीं। वह अद्वैत है, इससे निमित्तकारण नहीं। और समवायकारण भी इसलिए नहीं कि अपने स्वरूप में अन्यथाभाव नहीं हुआ। जैसे मृत्तिका के परिणाम से घट होता है, वैसे ही आत्मा का परिणाम जगत् नहीं है। आत्मा अच्युत है। वह जगत् कारण के बिना भासित हुआ था, इसमें भ्रममात्र ही था।
हे वधिक ! वस्तु वही होती है, तो जगत् की भ्रान्ति आत्मा में भासित हुई, इसलिए जगत् आत्म-रूप हुआ। जब सृष्टि उपजी न थी, तब अद्वैत आत्मसत्ता थी। उसमें संवेदन जगने से जगत् हुए की नाईं उदय हुआ, सो क्या हुआ—जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है तो वह किरण ही जलरूप प्रतीत होती है, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है। आत्मा ही जगद्रूप होकर भासित होता है। वहाँ न कोई शरीर था न कोई हृदय था। न पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश था और न उत्पत्ति और प्रलय था, न और कोई था। केवल चिन्मात्र-रूप ही था। हे वधिक ! ज्ञानदृष्टि से मुझे तो सच्चिदानन्द ही भासित होता है। वह शुद्ध और सब दुःखों से रहित परमानन्द है। जगत् भी वही रूप है। तुम सरीखे को जो जगत् शब्द-अर्थरूप भासित होता है सो आत्मा में कुछ हुआ नहीं, केवल चिन्मात्र सत्ता है। सर्वदा मुझको आत्मरूप ही भासित होता है। जो तू चाहे कि मुझको भी चिन्मात्र ही भासित हो तो ऐसा समझ कि सब कल्पना मन से त्यागने पर उसके पीछे जो शेष रहेगा, वह आत्मसत्ता है, सबका अनुभवरूप वही है। वह प्रत्यक्ष, शुद्ध, सर्वदा स्वभावसत्ता में स्थित और अमर है। तू भी उस स्वभाव में स्थित हो। हे वधिक ! आत्मसत्ता परमसूक्ष्म है; जिसमें आकाश भी स्थूल है। जैसे सूक्ष्म अणु में पर्वत स्थूल होता है, वैसे ही आत्मा में आकाश भी स्थूल है। आत्मा में यहाँ सूक्ष्मता है कि आत्मतत्त्वमात्र है, जिसमें कोई उत्थान नहीं, केवल निर्मल स्वभावसत्ता और निराभास है। उसी में यह जगत् भासित होता है, इससे वही रूप है। जैसे काल में क्षण, पल, घड़ी, पहर, दिन, मास, वर्ष और युगसंज्ञा जो होती है सो काल ही है, वैसे ही एक ही आत्मा