योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1500, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६६५
आवे ? यह जीव तब तक अन्त लेने को भटकता फिरता है, जब तक अविद्या नहीं नष्ट होती; जब अविद्या नष्ट होगी, तभी अविद्यारूप संसार का अन्त होगा । हे राम ! जगत् कुछ बना नहीं, वही ब्रह्माकाश ज्यों का त्यों स्थित है । उसका न जानना ही संसार है । जब तक उसका प्रमाद है, तब तक जगत् का अन्त न आवेगा । जब स्वरूप का ज्ञान होगा, तब अन्त आवेगा । सो वह जानना क्या है ? चित्त का निर्वाण करना ही जानना है । जब चित्त का निर्वाण होगा; तब जगत् का अन्त आवेगा । जब तक चित्त भटकता फिरता है, तब तक संसार का अन्त नहीं आता । इससे चित्त का नाम ही संसार है । जब चित्त आत्म-पद में स्थित होगा, तब जगत् का अन्त होगा । इस उपाय के बिना शान्ति नहीं प्राप्त होती ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिदुपाख्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकविंशतितमः सर्गः ॥ २२० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे जो दो विपश्चित् थे, उनकी क्या दशा हुई, यह भी कहो । वे तो दोनों एक ही थे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक का तो निर्वाण हुआ था, दूसरा ब्रह्माण्डों को नाँघता-नाँधता और एक ब्रह्माण्ड में गया । वहाँ उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ । उनकी संगति से उसको ज्ञान हुआ । ज्ञान को पाकर वह भी निर्वाण हो गया । बाकी एक अब तक दूर फिरता है और एक यहाँ पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर विचरणता है । हे राम ! यह जगत् आत्मा का आभास है । जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है और जब तक किरणें हैं, तब तक जलाभास निवृत्त नहीं होता, वैसे ही जबतक आत्म-सत्ता है, तब तक जगत् का चमत्कार निवृत्त नहीं होता और आत्मा के जानने से जगत्सत्ता नहीं रहती । जैसे किरणों के अदृश्य होने से जलाभास नहीं रहता और जो जल दिखता है तो भी किरणों ही की सत्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मा के जाने से आत्मा की सत्ता ही भासती है—भिन्न जगत् की सत्ता नहीं भासित होती । राम ने पूछा, हे भगवन् ! विपश्चित् एक ही था तो एक ही संवित् में भिन्न-भिन्न