योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1499, कुल 1734 में से
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चले तब पहुँचता है, वहाँ आधिभौतिक है और यह प्रमाद से होता है । जैसे रस्सी का भूलने से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से आधिभौतिक शरीर भासित होता है, और जैसे कोई मनोराज्य का पुर बनाकर उसमें आप भी एक शरीर बनकर चेष्टा करता फिरे तो उसे जब तक पूर्व का शरीर नहीं भूलता, तब तक वह संकल्प शरीर से चेष्टा करता है । वहाँ आन्तवाहक है । उस शरीर को संकल्पमात्र जानना 'विशेष बुद्धि' कहलाता है, आत्मबोध हुए बिना जो उस संकल्पशरीर में दृढ़ भावना होती है, तो उसका नाम आधिभौतिक होता है—वह घट-पट कहलाता है । इसमें जबतक शरीर का स्मरण है, तब तक आधिभौतिकता नहीं निवृत्त होती । और जब शरीर का विस्मरण होता है, तब आधिभौतिकता मिट जाती है । विपश्चित् आत्मबोध से रहित थे और जहाँ चाहते थे वहाँ चले जाते थे, पर स्वरूप से न कुछ आन्तवाहक है और न कुछ आधिभौतिक है । प्रमाद से ये सब आकार भासित होते हैं । वास्तव में सब चिदाकाशरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी, सब वही है, और उसी के प्रमाद से विपश्चित् अविद्याकृत जगत् को देखने चले थे । वह अविद्या भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं—ब्रह्म ही है, तब ब्रह्म का अन्त कहाँ आवे ? वहाँ से वे चले, परन्तु जानते थे कि हमारा आन्तवाहक शरीर है ।
निदान वे सब पृथ्वी को नाँघ गये । फिर जल को भी नाँघ गये । उनके बाद जो सूर्य सा दाहक अग्नि का आवरण प्रकाशमान है, उसको भी नाँघकर मेघ और वायु के आवरण को भी नाँघ गए । फिर आकाश को भी नाँघ गये । उनके बाद ब्रह्माकाश था, जहाँ उनको संकल्प के अनुसार फिर जगत् भासित होने लगा, पर उनको भी वे नाँघ गये । फिर आगे ब्रह्माकाश मिला, फिर उनको पञ्चभूत भासित हुए । उनके आवरण को भी वे नाँघ गये । फिर उस ब्रह्माण्डकपाट के बाद तत्त्वों को नाँघकर ब्रह्माकाश मिला । उसमें एक और पाञ्चभौतिक ब्रह्माण्ड था । उसको भी नाँघ गये, पर अन्त न पाया । स्वरूप के प्रमाद से दृश्य का अन्त जानने को वे भटकते फिरे, पर अविद्यारूप संसार का अन्त कैसे