योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1498, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६६३
नक्षत्रों का चक्र घूमता है। लोकालोक के जिस ओर वह आता है, उस ओर प्रकाश होता है। भूगोल ऐसे है, जैसे गेंद होता है। उसके एक ओर पाताल, एक ओर स्वर्ग है और एक ओर मध्यमण्डल है। आकाश सब ओर है। पातालवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं, आकाशवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं और मध्यवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं। इस प्रकार भूगोल है। उसके ऊपर महातमरूप एक शून्य खात है। वहाँ न पृथ्वी है, न कोई पहाड़ है, न स्थावर है, न जङ्गम है और न कुछ उपजा है। उसके ऊपर एक सुवर्ण की दीवार है, जिसका विस्तार दस सहस्र योजन है। उसके ऊपर दसगुना जल है। वह पृथ्वी को चहुँफेर से घेरे है। उससे परे दसगुना अग्नि है। फिर दसगुना वायु है। उसके आगे आकाश है। फिर ब्रह्माकाश महाकाश है, जिसमें अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। परन्तु ये तत्त्व जैसे तृण के आश्रय से कपूर ठहरता है, वैसे ही पृथ्वीभाग के आश्रय से ठहरे हैं। वास्तव में यह शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का चमत्कार है, जो आकाशवत् निर्मल है। उसमें कोई क्षोभ नहीं है। वह परमशान्त, अनन्त और सबका अपना रूप है।
हे राम ! अब फिर विपश्चित् का वृत्तान्त सुनो। जब वे लोकालोक पर्वत पर पहुँचे, तब एक शून्य खात (खाई) उनको देख पड़ा। वह पर्वत से उतरकर खात में जा पड़े। वह खात भी पर्वत के शिखर पर था। वहाँ शिखर की नाईं बड़े-बड़े पक्षी भी रहते थे, इस कारण उन पक्षियों ने चोंचों से इनके शरीर चूर्ण किये। तब उन्होंने अपने स्थूल शरीर को त्यागकर अपना सूक्ष्म अन्तवाहक शरीर जाना। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिभौतिकता कैसे होती है और अन्तवाहक क्या है ? फिर उन्होंने क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे कोई संकल्प में दूर से दूर चला जाय तो जिस शरीर से जाय वह अन्तवाहक है; और जो पाञ्चभौतिक शरीर प्रत्यक्ष दिखता है वह आधिभौतिक है। जब मार्ग में कहीं जाने को चित्त में संकल्प उठता है, तब स्थूल शरीर गये बिना नहीं पहुँच सकता और जब मार्ग में