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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1497, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1497

६६२ ❊ योगवासिष्ठ ❊

अनन्तकोटि योजन है। उस ब्रह्माण्ड का उसमें भूगोल है। उसके उत्तर में सुमेरु पर्वत, पश्चिम में लोकालोक पर्वत है, और ऊपर नक्षत्रचक्र घूमता है। जहाँ वह जाता है, वहाँ प्रकाश होता है, और जहाँ वह नहीं होता, वहाँ तमरूप भासित होता है सो सब संकल्प की रचना है। जैसे बालक संकल्प से पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही चैतन्यरूपी बालक ने यह संकल्परूपी भूगोल रचा है। हे राम! जैसे-जैसे उस समय उसमें निश्चय हुआ है वैसे ही वैसे वह स्थित हुआ है। जहाँ पृथ्वी रची है, वहीं वह स्थित है। जहाँ खात रचा है, वहाँ खात ही है। परन्तु जैसे स्वप्न में अविद्यमान प्रतिभा होती है वैसे ही भूगोल है। हे राम! जिनको ऐसा ज्ञान है कि सुमेरु में देवता और पूर्वाद दिशाओं में मनुष्य आदि जीव रहते हैं, वे पण्डित होने पर भी मूर्ख हैं; क्योंकि ये देवता आदि तो भ्रममात्र हैं, कुछ बने नहीं। जो मुझ सरीखे तत्त्ववेत्ता हैं, उनको ज्ञाननेत्र से आत्मसत्ता ज्यों की त्यों दिखती है, और जो अज्ञानी मन सहित षट् इन्द्रियों से देखते हैं, उनको जगत् दिखता है; ज्ञानवानों को परब्रह्म सूक्ष्म ज्यों का त्यों भासता है। वे जगत् को असत् जानते हैं। जैसे आकाश में अनहोती नीलमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में अनहोता जगत् दिखता है। जैसे नेत्र दोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासित होता है। सो वह केवल आभासमात्र है।

हे राम! जगत् उपजा भी दिखता है। और नष्ट होता भी दिखता है, परन्तु बना कुछ नहीं। जैसे संकल्प का रचा नगर अपने मन में भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मन में फुरता है। यह सम्पूर्ण भूगोल संकल्प में स्थित है। जैसे बालक संकल्प करके पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही भूगोल है। यह ब्रह्माण्ड सोकोटि योजन पर्यन्त विस्तृत है। उसका एक भाग नीचे गया है और एक ऊपर को। उसमें चैतन्य रूपी बालक ने यह भूगोल रचा है, सो संकल्प के आश्रय से खड़ा है। जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही भासता है। इस पृथ्वी के उत्तर में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम और लोकालोक पर्वत है और ऊपर तारों और