योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1496, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ६६१
गया इससे उसकी संवित् में सब अर्थ शून्य हो गये और वह वहाँ मुक्त हुआ। एक मच्छ के उदर में सहस्र वर्ष पर्यन्त रहा। फिर एक देश का राजा हुआ और वहाँ राज्य करने लगा। एक चन्द्रमा के निकट गया, वहाँ मरकर चन्द्रमा के लोक को पहुँचा। और एक बहता हुआ समुद्र के पार हुआ और आगे चौरासी हजार योजन पृथ्वी को नाँघता गया। इसी प्रकार चारों फिर जिये और समुद्र, वन और पर्वतों को नाँघते गये।
सबको आगे दशसहस्र योजन सुवर्ण की पृथ्वी मिली, जहाँ देवताओं के विचरने के स्थान हैं। उसको भी वे नाँघते गये। आगे लोकालोक पर्वत आया, जिसने सब पृथ्वी को घेर लिया है। जैसे वृक्षों से वन का आवरण होता है, वैसे ही उस पर्वत ने पचास कोटि योजन पृथ्वी का आवरण किया है। वह पचास हजार योजन ऊँचा है—वे उस लोकालोक पर्वत में पहुँचे, जहाँ तारों का नक्षत्रचक्र घूमता है। उसको भी वे नाँघ गये। उसमें आगे एक शून्य नक्षत्र था। वह महाशून्य था। वहाँ पृथ्वी, जल आदि कोई तत्त्व न था। एक शून्य आकाश है, जहाँ न कोई स्थावर पदार्थ है, न कोई जङ्गम पदार्थ है, न कोई उपजता है न कभी मिटता है। उसको भी उन्होंने देखा। इसी प्रकार सम्पूर्ण भूगोल उन्होंने देखा। राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूगोल क्या है? किसके आश्रय में है? उसके ऊपर क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे गेंद होता है, वैसे भूगोल है और वह संकल्प के आश्रय में है। उसके सब ओर आकाश है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र सहित यह चक्र फिरता है। हे राम ! यह कोई वस्तु बुद्धि से नहीं बनी, संकल्प से बनी है। जो वस्तु बुद्धि से बनी होती है, वह क्रम से स्थित होती है, पर यह तो विपर्यरूप से स्थित है। पृथ्वी के चहुँफेर दसगुना जल है। उसके बाद दसगुनी अग्नि है। उसके उपरान्त दसगुना वायु है और फिर ब्रह्माण्ड खप्पर है।
वह खप्पर एक नीचे और एक ऊपर को गया है उसके मध्य में जो पोल है, वह आकाश है, जो वज्रसार की नाईं है। इसका विस्तार