सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1476, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1476

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६७१

आत्मसत्ता जगतरूप होकर भासती है । सो वही आत्मसत्ता भाव में अभावरूप है । जैसे आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् आत्मारूप है । इससे जो कुछ भासित होता है, वह चैतन्य का आभास प्रकाश है और परमार्थसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । इससे इतर कहिये तों न द्रष्टा है और न दृश्य है, आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है । राम ने पूछा, हे ब्राह्मण, ब्रह्म के ज्ञाता ! जो इसी प्रकार है तो कारण-कार्य का भेद कैसे होता दीखता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उसमें जैसा-जैसा फुरना होता है, वैसा ही वैसा रूप होकर भासित होता है । चैतन्य आकाश ही जगतरूप होकर भामता है, और न कहीं कारण है, न कार्य । जैसे स्वप्नसृष्टि जो कारण-कार्यसहित भासित होती है, वह किसी कारण से नहीं उपजी—अकारणरूप है, वैसे ही यह सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजी, अकारणरूप है । न कहीं कर्त्ता है और न भोक्ता । केवल भ्रम से कर्त्ता-भोक्ता भासित होता है और स्वप्न की नाईं विकल्प उठते हैं—वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है ।

हे राम ! जैसे स्वप्न में नगर और जगत् दिखता है, वह चिदाकाश अनुभवसत्ता ही ऐसे होकर भासित होती है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् सम्पूर्ण चिदाकाश है । जब ऐसे जानोगे, तब जगत् भी ब्रह्मतत्त्व दिखेगा । हे राम ! यह जगत् चित्त के फुरने से उपजा है । जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, वैसे ही चित्तभ्रम से जगत् की कल्पना होती है, पर इसका कारण ब्रह्म ही है । और कारण कहीं नहीं, क्योंकि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है, अतःकारण किसका हो ? वही सत्ता इन्द्र, रुद्र, नदियाँ पर्वत आदि जगत् होकर भासती है । उसमें भिन्न द्वैतरूप कुछ नहीं । इसमें जैसा-जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही रूप दिखता है । जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है, वैसा ही रूप भासित होता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है, वैसा ही पदार्थरूप होता है ।

इति नि० कारणकार्याभाववर्णनं नाम षोडशाधिकद्विशततमस्सगंः ॥२१६॥