योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1475, कुल 1734 में से
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भावना मिट जाती है। इस प्रकार जो जानता है, वह ज्ञानवान् है। वह पुरुष इन्द्रियों से देखता, सुनता, ग्रहण करता भी निर्वासनिक ही जाता है और जगत की ओर से घनसुषुप्त होता है। हे राम! जिसका मन निर्वासनिक और शान्त हुआ है, वह बोलता, चलना, खाता, पीता भी पाषाण-सदृश मौन हो जाता है—उसमें यह जगत कुछ उत्पन्न नहीं। जैसे मृगतृष्णा की नदी अनहोनी भासती है और भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासित होता है, वैसे ही मन के भ्रम में आत्मा में जगत भासित होता है। आदिकारण से कुछ नहीं उत्पन्न हुआ। जिसका आदिकारण न पाइये, वह कारण भी असत्य जानिये। इससे सब जगत कारण के बिना ही भासता है, उपजा कुछ नहीं। हे राम! जो पदार्थ कारण के बिना भासता है और जिसमें भासता है वह अधिष्ठानसत्ता है, क्योंकि जो अधिष्ठान में भासित होता है उसको भी वही रूप जानिये और जो अधिष्ठान से व्यतिरेक भासित हो, उसे भ्रममात्र जानिये। जैसे स्वप्न में इन्द्रियादिक पदार्थ भासित होते हैं और उसमें दृश्य दर्शन सब मिथ्या है, हुआ कुछ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत भी मिथ्या है। न कुछ उपजा है, न स्थित हुआ है। न आगे होना है और न नाश होता है। जब उपजा ही नहीं, तब नाश कैसे हो? न कोई द्रष्टा है, न दर्शन है, न दृश्य है; केवल चिन्मात्र-सत्ता अपने आपमें स्थित है।
रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह द्रष्टा, दर्शन और दृश्य क्या है और कैसे भासित होता है? यह आपने पहले भी कहा है और अब फिर भी कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह दृश्य सब अदृशरूप है; अकारण ही दृश्य होकर भासित होता है। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, जो कुछ जगत विस्तारसहित दीखता है वह आदिस्वरूप है। जैसे स्वप्न में आकाश का वन दिखे और पदार्थ दिखे भी वे सब चिदाकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत भी चिन्मात्ररूप है—कारण-कार्यभाव कहीं नहीं। जैसे वायु स्पन्दरूप होती है, तब प्रतीत होती है और निष्पन्द होने पर नहीं प्रतीत होती, वैसे ही आत्मा में जब चित्त फुरता है, तब