योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1474, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ६६६
फुरने से जगतरूप होकर प्रकट होती है । जैसे जाग्रत् के अन्त में अद्वैत सत्ता होती है और फिर उससे स्वप्न की सृष्टि भासित होती है, पर स्वप्न की सृष्टि वास्तव में नहीं उपजी, वही अनुभव स्वप्न की सृष्टि होकर भासित होता है, वैसे ही यह जगत् जो कार्यरूप दिखता है, सो अविद्या से दिखता है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं । जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण दिखती है, वैसे ही यह सृष्टि अकारण है । ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सब स्थावर-जङ्गम जगत् चिदाकाश रूप है । कुछ उत्पन्न नहीं हुआ और जो दूसरा कुछ न हुआ तो कारण-कार्य भी कुछ न हुआ ।
हे राम ! न कोई द्रष्टा है, न कोई दृश्य है न भोक्ता है और न भोग है, सब कल्पनामात्र है । आत्मा के अज्ञान से कल्पनाएँ उठती हैं और आत्मज्ञान से लीन हो जाती हैं—जैसे समुद्र के जाने से तरङ्ग कल्पना मिट जाती है; क्योंकि अनुभव आत्मा में कारण-कार्य कुछ नहीं हुआ । जो तुम कहो कि कारण-कार्य क्यों भासित होते हैं, तो जैसे इन्द्रजाल की बाजी में नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं बने, वैसे ही यह जगत् कारण-कार्य कुछ बना नहीं । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही नगररूप होकर दिखता है, वैसे ही यह जगत् दिखता है । हे राम ! आत्मसत्ता ही फुरने से जगत् की नाईं भासती है । जिस जगत् को इदम् रूप कहते हैं, वह अहंरूप है । जिसको समुद्र कहते हैं, वह भी अहंकाररूप है । जिसको रुद्र कहते हैं, वह अपना ही अनुभवरूप है इत्यादि । जो सब जगत् भासित होता है वह भावनामात्र है । जिसकी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसा ही रूप होकर भासता है । जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु में जैसी भावना होती है, वैसे ही सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जैसी भावना होती है, वैसी ही होकर भासित होती है । इससे जब चिदाकाश का निश्चय दृढ़ होता है, तब अज्ञान से जो विरुद्ध भावना हुई थी, वह निवृत्त होती है ।
इति श्रीयो० जगन्निर्वाणवर्णनंनामपञ्चदशाधिकद्विशततमस्सर्गः॥२१५॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मन थोड़ा भी फुरता है, तब यह जगत् उत्पन्न हो आता है और जब फुरने से रहित होता है, तब जगत्-