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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1469, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1469

६६४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

दिखता है और विचार करने से कुछ नहीं पाया जाता। हे राम! अपन कल्पना ही जीव को जगतरूप भासित होती है, और कुछ नहीं। जे स्वप्न की सृष्टि अपनी कल्पना है, परन्तु निद्रादोष से अपने में भि दिखती है और उसमें राग-द्वेष उपजता है, पर जागने पर सब क्षो मिट जाते हैं, वैसे ही अज्ञान से जगत् सत्य लगता है और उसमें राग द्वेष भासित होते हैं और ज्ञान से शान्त हो जाते हैं। हे राम! य जगत् भ्रममात्र है। ज्ञानवान् के निश्चय में सब चिदाकाश है औ अज्ञानी के निश्चय में जगत् है। यदि बड़े क्षोभ प्राप्त हों तो भी ज्ञानवान् को डिगा नहीं सकते, क्योंकि उसके निश्चय में कुछ द्वै नहीं फुरता, वह सदा एकरस रहता है। यदि प्रलयकाल के मेघ गर्जे समुद्र उमड़ें और पहाड़ के ऊपर पहाड़ पड़ें, जिसमे भयानक शब् हों तो भी ज्ञानवान् के निश्चय में कुछ द्वैत नहीं फुरता। जैसे कोई पुरु सोया पड़ा हो तो उसके स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं और जगत् के निकट बैठे भी नहीं भासित होते, वैसे ही ज्ञानवान् के निश्चय में द्वै कुछ नहीं भासता; क्योंकि है नहीं। और अज्ञानी को होते भासते हैं जैसे बन्ध्या स्त्री स्वप्न में अपने पुत्र को देखती है, सो अनहोता भी वह भ्रम से उसको भासता है, वैसे ही अज्ञानी को अनहोता जगत् सत्य लगता है।

हे राम! भ्रम से अनहोता जगत् दिखता है और होने का अभाव प्रतीत होता है। जैसे बन्ध्या अनहोते पुत्र को देखती है और पुत्रवाला स्वप्न में पुत्र का अभाव देखता है, वैसे ही अज्ञान से अनहोता जगत् सत् भासित होता है और सदा अनुभवरूप आत्मा का अभाव प्रतीति होता है। सो भ्रम में ही और का और भासता है। दिन में सोया हुआ पुरुष स्वप्न में रात्रि देखता है और रात्रि को सोया हुआ स्वप्न में दिन देखता है, शून्यस्थान में नाना प्रकार के व्यवहार और अन्धकार में प्रकाश देखता है, सो भ्रम में ही देखता है। पृथ्वी पर सोया मनुष्य स्वप्न में आकाश पर दौड़ता फिरता है और अपने को गड्ढे में गिरता देखता है। यह सब भ्रम से ही दिखता है। वैसे ही यह जाग्रत जीव भ्रम से ही जाग्रत को