योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1468, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ६६३
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार यह जगत् आभास फुरा है और भासित होता है, यह भी सुनो। आदि जो शुद्ध अचेत चिन्मात्र है, उसमें जब चेतनता फुरती है, तब वह वेदन होती है। उसमें शब्द-तन्मात्रा होती है। फिर उसमें आकाश उत्पन्न होता है। फिर स्पर्श की इच्छा होती है, तब वायु उपजती है। जब आकाश में क्षोभ होता है, तब उस वायु और आकाश के संघर्षण से अग्नि उपजती है। जब अग्नि में उष्णस्वभाव होता है, तब जल उत्पन्न होता है, अर्थात् जब तेज की अधिकता होती है, तब जल उत्पन्न होता है। जब स्वेद-सा जल बहुत इकट्ठा होता है, तब उसने पृथ्वी उत्पन्न होती है। इस प्रकार आकाश और वायु में जल और पृथ्वी उत्पन्न होते हैं। तब तत्त्वों से शरीर उपजते हैं और स्थावर-जङ्गम नाना प्रकार का जगत् दिखता है। वह सब पाञ्चभौतिक है। वास्तव में न पञ्चभूत हैं न कोई उपजता है और न नष्ट होता है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में आरम्भ-परिणाम-सहित नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं, आत्मसत्ता ही जगत् के आरम्भ-परिणाम-सहित भासती है, परन्तु वास्तव में कुछ उपजा नहीं, आत्म-सत्ता ही चित्त के फुरने में जगद्रूप भासती है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी जानो। हे राम ! यह सब जगत् अपना अनुभवरूप है, पर भ्रम से आकारसहित दिखता है। जब भली-भाँति विचार करके देखिये तब जगद्भ्रम मिट जाता है, केवल चैतन्य आत्मतत्त्वमात्र शेष रहता है। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में नाना प्रकार के क्षोभ होते हैं, और जब जागता है तब एक आप ही रहता है, वैसे ही आत्मसत्ता में जागने से अद्वैत-ही-अद्वैत भान होता है।
हे राम ! जो बोधसमय में द्वैत कुछ न भासित हो तो अबोध के समय भी जानिये कि द्वैत कुछ नहीं हुआ, और जो बोध के समय सत्य भासित हो तो जानिये कि सर्वदा यही सत्ता है। हे राम ! यह निश्चय करो कि जगत् कुछ वस्तु नहीं—जैसे आकाश में नीलता, किरणों में जल और रश्मी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत्