योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५२ योगवाशिष्ठ
है और अपनी ही संवित् में स्थित है । जैसे आरसी में प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही अपनी संवित् में जगत् स्थित है । उसको जो द्वैत जानता है और राग-द्वेष में जलता है, ऐसे अज्ञानी को देखकर ज्ञानी हँसता है और व्यवहार करता भी हँसता है । जैसे किमी ने स्वप्न में हाथ सुवर्ण दिया और फिर ले लिया और इसने उसको स्वप्न जाना तो रोदन करता है, परन्तु हँसता है और कहता है कि यह मेरा ही स्वरूप है । वैसे ही ज्ञानी व्यवहार करता भी अपने निश्चय में हँसता है । जैसे किमी ग्राम में अग्नि लगे और एक पुरुष उस गाँव से निकलकर पर्वत पर जा बैठे, तब वह जलतों को देखकर हँसता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भी संसाररूपी जलते नगर से निकलकर आत्मरूपी पर्वत पर जा बैठता है और अज्ञानियों को जलता देखकर हँसता है, अर्थात् आप अशोक होकर उनको सशोक देखता है ।
हे राम ! जब ज्ञानवान् बोधदृष्टि से देखता है, तब अद्वैतसत्ता दिखती है, और जब अन्तवाहक में स्थित होकर देखता है, तब जैसे पदार्थ होते हैं, वैसा ही उनको देखता है और अपने को सदा शान्तरूप देखता है । मतलब यह कि जो आत्मतत्त्व परमानन्दस्वरूप है, उसमें भिन्न जितने पदार्थ हैं वे सब दोषरूप हैं और सिद्धि आदि जितनी क्रिया हैं, वे संसार का कारण हैं । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग बड़े और कई छोटे