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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1456, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1456

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५१

सकुचा लेते हैं। जैसे कछुआ अपने अङ्गों को समेट लेता है, वैसे ही वे अपने निश्चयरूपी अङ्ग को समेट लेते हैं, पर जिसको अधिकारी देखते हैं, उसके आगे प्रकट करते हैं। हे राम! पात्र में रक्खा पदार्थ शोभा पाता है, अपात्र में रक्खा अशोभन हो जाता है। जैसे गौ को घास देने से वह दूध हो जाती है और सर्प को दूध देने से वह विष हो जाता है, वैसे ही अधिकारी को दिया उपदेश शुभ होता है और अनधिकारी को अनिष्ट हो जाता है। हे राम! अणिमा आदि जो सिद्धियाँ हैं, वे जप, द्रव्य, काल अथवा देश से सबको प्राप्त होती हैं—अभ्यास के बल से अज्ञानी को भी प्राप्त होती हैं—और ज्ञानी को तो होती ही हैं, परन्तु ये ज्ञान का फल नहीं, जप आदिक का फल हैं। जिसकी सिद्धि के लिए जो पुरुष दृढ़ होकर लगता है, वही सिद्ध होता है। जो इन सिद्धियों का दृढ़ अभ्यास करता है तो उनसे आकाश-मार्ग में उड़ने और आने-जाने लगता है। पर ये पदार्थ तबतक अच्छे लगते हैं, जब तक आत्ममार्ग नहीं सूझता।

हे राम! परम सिद्धता इनसे नहीं प्राप्त होती। परमसिद्धि आत्मपद है। जिसको आत्मपद की प्राप्ति हुई है, वह इन सिद्धियों की अभिलाष नहीं करता। ऐसा पदार्थ पृथ्वी में कोई नहीं और न आकाश में देवताओं के स्थानों में ही है, जिसमें ज्ञानी का चित्त मोहित हो। ज्ञानवान् को सब पदार्थ मृगतृष्णा के जल से लगते हैं। मेरा सिद्धान्त तो यही है कि सदा विषयों से उपरत रहना और आत्मा को परम इष्ट जानना ही ज्ञान है। ज्ञानी को जो प्रारब्ध से प्राप्त हो, उसको वह करता है, परन्तु करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ प्रत्यवाय भी नहीं होता। न किसी अर्थ का वह आश्रय करता है, न उसके निमित्त किसी भूत का आश्रय करता है, और सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित होता है। ऐसे निश्चय को पाकर उसे आश्चर्य होता है। वह कहता है कि बड़ा आश्चर्य है, जो सदा अपना स्वरूप है उसको भूल कर मैं इतने काल तक भरमता रहा? पर अब मुझको शान्ति प्राप्त हुई है। जगत् को देखकर वह हँसता है, क्योंकि यह जगत् आभासरूप