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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1455, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1455

६५० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अज्ञानी के तुल्य ही है, पर हृदय मे वे शान्तरूप हैं। ब्रह्मचर्य से भी हृदय में धैर्य होता है और तपस्या से भी राग-द्वेष कुछ नहीं फुरता एक मिथ्या तपस्वी है, जो वैसे ही बन बैठते हैं। उनका निश्चय सत्य है अथवा असत्य, वे असल हैं या नकली, यह कैसे जानिये ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! यह निश्चय सत्य हो अथवा असत्य, ये लक्षण सन्त के ही हैं। आत्मा के साक्षात्कार का निश्चय मनुष्य अपने आपसे जानता है और किसी से नहीं जाना जाता, इस कारण उसका लक्षण ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जानता। जैसे सर्प के खोज को सर्प ही जानता है और कोई नहीं जानता, वैसे ही ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद्य है। हे राम ! ये जो गुण कहे हैं, सो ज्ञानवान् में स्वाभाविक ही रहते हैं, दूसरे को यत्नसाध्य हैं। ज्ञानवान् को सब जगत् भ्रान्तिमात्र है अथवा अनुभवदृष्टि से अपना रूप ही दिखता है, इसी कारण ज्ञानी परमशान्त है और उसके निश्चय में राग-द्वेष नहीं फुरता। वह अपने निश्चय को बाहर नहीं प्रकट करता, पर जो अधिकारी है, वह उसको जानता है। जो अनधिकारी अज्ञानी है, वह उसको नहीं जान सकता। जैसे वन में चन्दन की बड़ी सुगन्ध होती है, परन्तु दूर से नहीं जान पड़ती, वैसे ही अज्ञानी उसके निश्चय से दूर है, इस कारण वह नहीं जान सकता। चर्मदृष्टि से उसको देखे तो नहीं देख सकता और वह अधिकारी बिना जनाता भी नहीं। जैसे अमूल्य चिन्तामणि नीच को दीजिये तो भी वह उसके माहात्म्य को नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि है, अनधिकारी अज्ञानी उसका माहात्म्य नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है—इसी कारण ज्ञानवान् उसे प्रकट नहीं करते।

हे राम ! यह जो प्रकट है कि हमको अर्थ की प्राप्ति होगी, हमारा मान होगा, हमारे चेले बनेंगे और हमारी पूजा होगी, उसे ज्ञानवान् गन्धर्वनगर और इन्द्रजाल की नाईं जानते हैं। फिर वे किसकी चाह करें ? इस कारण वे अनधिकारी को अपना इष्ट नहीं प्रकट करते, और जो कोई उनके निकट बैठता है तो भी अपने निश्चयरूपी अङ्ग को वे