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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1454, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1454

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६४६

नहीं होता । उनकी स्वाभाविक चेष्टा ऐसी होती है—वह सबसे मित्र-भाव रखता है । न उससे कोई खिन्न होता है और न वह किसी से खिन्न होता है । जब उसे सुख प्राप्त होता है, तब वह रागवान् दिखता है और दुःख की प्राप्ति में द्वेषी दिखता है; परन्तु निश्चय से उसको हर्ष-शोक कुछ नहीं । जैसे नट स्वाँग लाता है और जैसा स्वाँग होता है, वैसी ही चेष्टा करता है—राजा का स्वाँग हो अथवा दरिद्री का, परन्तु निश्चय उसे अपने स्वरूप में ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख-दुःख दिखते हैं, परन्तु निश्चय उसका आत्मस्वरूप में ही होता है । वह पुत्र, धन, बान्धव आदि को बुलबुले की नाईं जानता है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं और फिर लीन भी हो जाते हैं, परन्तु जल को कुछ राग द्वेष नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष कुछ नहीं होता । वह सब पर दया रखता है और पतित-प्रवाह में जो सुख-दुःख आकर प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जैसे वायु दुर्गन्ध-सुगन्ध को साथ ले जाती है, परन्तु उसको उससे रागद्वेष कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं होता । वह बाहर अज्ञानी की नाईं व्यवहार करता है, परन्तु निश्चय में जगत् को भ्रान्तिमात्र जानता अथवा 'सबब्रह्म' जानता है । वह सदा स्वभाव में स्थित रहता है और अनिच्छित प्रारब्ध को भोगता है, परन्तु जाग्रत् में सुषुप्ति की नाईं स्थित रहता है, भूत और भविष्य की चिन्ता नहीं करता और वर्तमान में विचरता है—वह हृदय से शीतल रहता है और बाहर इष्ट-अनिष्ट दिखते हैं । पर हृदय से वह अद्वैतरूप है । ज्ञानवान् कर्म करता है परन्तु कर्म में अकर्म को जानता है और जीना ही मृतक की नाईं है । हे राम ! जैसे मृतक होता और उसको फिर जगत् की कलना नहीं फुरती, वैसे ही जिसको आत्मपद में अहंप्रत्यय हुआ है, उसको द्वैत नहीं भासता । प्रत्यक्ष व्यवहार उसमें दिखता भी है, परन्तु निश्चय में अर्थ शान्त हो गया है ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! ये ज्ञानी के जो लक्षण आपने कहे सो उनको वही जानें और कोई नहीं जानता; क्योंकि बाहर की चेष्टा तो