योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1453, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६४८ = * योगवाशिष्ठ *
वे ऐसे जानते हैं, जैसे वन के वृक्ष और पत्ते होते हैं, और स्त्री-पुत्रादि के साथ वे वन के मृग के पुत्र से होते हैं। जैसे जंगली मृगों का मन्न में स्नेह नहीं होता, वैसे ही वे पुत्रादिक में भी स्नेह नहीं करते। जैसे माता का पुत्र पर दया और ममता होती है, वैसे ही वे सब पर दया करते हैं, और निश्चय में उदासीन रहते हैं। जैसे आकाश किसी से स्पर्श नहीं करता, वैसे ही वे किसी में लिप्त नहीं होते। आपदा उनको परमसुख होती है। जितने जगत में रस हैं, वे उनको विरस हो जाते हैं। वे न किसी में राग करते हैं और न किसी में द्वेष। वे तृष्णा करते भी दिखते हैं, परन्तु हृदय में जड़ और पत्थर की नाईं होते हैं। व्यवहार करते भी हैं, परन्तु निश्चय में परमशून्य और मौन होते हैं; अर्थात् सदा समाधि में स्थित रहते हैं। वे सब कर्म करते दिखते हैं, सो इस प्रकार करते हैं कि सब उनकी स्तुति करते हैं। वे यत्न से रहित सब कर्मों का आरम्भ करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अपने को अकर्ता मानते हैं। जो कुछ उन्हें प्रारब्ध गति से प्राप्त होता है, उसे भोगते हैं और देश काल-कर्म, सबको अङ्गीकार करते हैं। जो परलोकादि अनिष्ट आगत प्राप्त होते हैं उनका त्याग भी करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अकर्ता ज्यों के त्यों रहते हैं। वे सुख-दुःख की प्राप्ति में समबुद्धि रहते हैं। प्राकृत आचार यथाशास्त्र करते हैं, परन्तु स्वरूप से कभी विचलित नहीं होते। जैसे फूल की चोट से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही दुख सुख की प्राप्ति में नहीं डिगते। वे सदा स्वभाव में स्थित रहते हैं और सुख-दुःख को भोगते भी दिखते हैं, पर उनके निश्चय में कुछ नहीं होता।
जैसे स्फटिकमणि के सम्मुख कोई रङ्ग रखिये तो उसमें झलकता है परन्तु उसका रूप कुछ और नहीं हो जाता, वह ज्यों का त्यों ही रहती है, वैसे ही सुख-दुःख के भोग ज्ञानवान् में भी दिखते हैं, परन्तु वे स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होते। चेष्टा वे अज्ञानी की नाईं करते हैं, परन्तु निश्चय से परमसमाधिस्थ हैं। जैसे अज्ञानी को भविष्यत् का राग-द्वेष या सुख-दुःख कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी को वर्तमान का राग-द्वेष