योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1458, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻
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और परमदया की खान होता है। जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर वर्षा करते हैं, सो उस जल का स्थान समुद्र ही होता है, तैसे ही जितने लोग दयालु दिखते हैं, वे ज्ञान के प्रसाद से ही दया करते हैं। दया का स्थान ज्ञानवान् ही है। ज्ञानवान् सबका हृदय है। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य आकर प्राप्त होता है, उसे वह करता है, और जो शरीर को दुःख आकर प्राप्त होता है, उसे ऐसे देखता है, जैसे अन्य के शरीर को हो रहा हो। अपने में वह सुख-दुःख, दोनों का अभाव देखता है।
जिनको यह अभ्यास नहीं हुआ, वे शरीर के राग-द्वेष से संतप्त होते हैं। ज्ञानी को शान्ति युक्त देखकर औरों को भी प्रसन्नता हो आती है। जैसे पुण्य करके जो स्वर्ग को गया है, उसे वहाँ इष्ट पदार्थ दिखते हैं, कल्पवृक्ष की सुन्दर मञ्जरियाँ और सुन्दर अप्सरा आदि दिखती हैं, जिन पदार्थों को देखकर प्रसन्नता उपजती है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति जो पुरुष करता है, उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शीतल करता है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति शीतलता उपजाती है। ज्ञानवान् आत्मपद को पाकर आनन्दित होता है और वह आनन्द कभी दूर नहीं होता, क्योंकि उसको उस आनन्द के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण समान लगती हैं। हे राम! ऐसे पुरुषों को आचार और जिन स्थानों में वे रहते हैं, वह भी सुनो। कई तो एकान्त में जा बैठते हैं, कई शुभ स्थानों में रहते हैं, कई गृहस्थी ही में रहते हैं, कई अवधूत होकर सबको दुर्वचन कहते हैं, कई तपस्या करते हैं, कई परम ध्यान लगाकर बैठते हैं, कई नंगे फिरते हैं, कई बैठे राज्य करते हैं, कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं, कई परम मौन धारे हैं, कई पहाड़ की कन्दराओं में जा बैठते हैं, कई ब्राह्मण हैं, कई संन्यासी हैं, कई अज्ञानी की नाईं विचरते हैं, कई नीच पामर होते हैं, कई आकाश में उड़ते हैं और नाना प्रकार की क्रिया करते दिखते हैं, परन्तु सदा अपने स्वरूप में स्थित हैं।
हे राम! देह और इन्द्रियाँ पुरुष नहीं और अन्तःकरण चतुष्टय भी