योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1459, कुल 1734 में से
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पुरुष नहीं, पुरुष केवल चिदाकाशरूप है। वह न कुछ करता है और न किसी से उसका नाश होता है। जैसे नट स्वाँग भरता और मचेष्टा करता है, परन्तु नटभाव में अपने को असंग देखता है, वैसे ही ज्ञानवान् व्यवहार भी करते हैं, परन्तु अपने को अकर्ता और असंग देखते हैं। वे ऐसा निश्चय रखते हैं कि हम अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल और सनातन हैं। हे राम! इस प्रकार जिसको आत्मा में अहं प्रतीति हुई है, उसका नाश कैसे हो और वह बन्धन में कैसे पड़े? वह पुरुष चाहे जैसे आरम्भ करे और चाहे जैसे स्थान में रहे, उसको बन्धन नहीं होता। चाहे वह पाताल में चला जाय, आकाश में उड़ता फिरे अथवा देशान्तर में घूमता फिरे उसको न कुछ अधिक है और न कुछ न्यून है। पहाड़ में चूर्ण हो जाय तो भी वह चूर्ण नहीं होता। यह तो चैतन्य पुरुष है। शरीर का नाश होने से उसका नाश कैसे हो? ऐसे अपने स्वरूप में वह सदा स्थित है और आकाश सदृश परम निर्मल, अजर, अमर और शिवपद है। इससे हे राम! ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक द्वादशसर्गः ॥२१२॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक भावमात्र, दूसरा भाममात्र और तीसरा भामितमात्र है। भावमात्र केवल चैतन्यमात्र को कहते हैं। उसमें जो चेत्योन्मुखता अहंकार का उत्थान हुआ, उसका नाम भाम है, और उसमें जो जगत् हुआ, उसका नाम भामित है। भामित कल्पित का नाम है। कल्पित के नाश से अधिष्ठान का नाश नहीं होता। जो अधिष्ठान कुछ और भाव हो तो उसका नाश भी हो। वह तो और कुछ बना नहीं। उसके फुरने से तीन संज्ञा हुई हैं; अतएव फुरना भी उर्मी का किञ्चन है। आत्मा फुरने या न फुरने में ज्यों का त्यों है। जैसे स्पन्दन और निस्पन्द वायु एक ही है, वैसे ही बोध और अबोध में आत्मा एक ही है। बोध, अबोध, फुरना न फुरना एक रूप है। हे राम! उस आत्मा का किसमें और कैसे नाश हो? चैतन्य भी मरता हो तो इसका किञ्चन जगत् कैसे रहे? किञ्चन आभास को कहते हैं, वह