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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1460, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1460

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५५

आभास अधिष्ठान के बिना नहीं होता, इससे आत्मा का नाश नहीं होता। और तुम जो चैतन्य को भी मरता मानो कि मरकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द की बात है। मेरा भी यही उपदेश है कि चेतनता मिटे। जब चेतनता उपजती है, तब जगत् भासित होता है। उसके मिटने पर आत्मा ही शेष रहेगा। ब्रह्म चैतन्य का तो नाश नहीं होता। जो तुम कहो कि वह चैतन्य नष्ट हो जाता है—यह और चैतन्य है, जिससे जगत् होता है, तो हे राम! अनुभव तो एक ही है, उसका नाश कैसे मानिये? जैसे बरफ शीतल है, चाहे किसी ठौर पान कीजिये वह सबको शीतल ही है, और अग्नि उष्ण ही है, चाहे जिस जगह से स्पर्श कीजिये, उष्ण ही अनुभव होता है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। वह एक अखण्डरूप है, जहाँ कोई पदार्थ दिखता है, उसी चेतनता में प्रकाशित होता है। वह चैतन्यसत्ता स्वच्छ, निर्मल और अद्वैत तथा सदा अपने आप में स्थित है; उसका नाश कैसे हो?

जो तुम शरीर के नाश से आत्मा का नाश होता मानो तो ठीक नहीं, क्योंकि शरीर यहाँ अखण्ड पड़ा है और वह परलोक में चेष्टा करता है। और पिशाच आदि का शरीर भी नहीं देख पड़ता। जो शरीर के बिना उसका अभाव होता हो तो उनका भी अभाव हो जाता। इससे शरीर का अभाव होने पर आत्मा का अभाव नहीं होता, क्योंकि शरीर के निर्जीव होने पर शरीर से कुछ चेष्टा नहीं होती, क्योंकि जीवकला में पुर्यष्टका नहीं है। शरीर तो अखण्ड पड़ा है, उसमें कुछ नहीं होता और जीव परलोक में सुख-दुःख भोगता है, तो शरीर का नाश होने पर उसका नाश नहीं हुआ। जो तुम कहो कि सब स्वभाव उसमें रहता है तो सर्वदा उसको क्यों नहीं देखते? उसी समय अपने को क्यों मृतक देखते हैं और बन्ध बान्धव भाई, सब उसी समय क्यों मृतक जानते हैं। जो तुम कहो कि जीवित धर्म से वेष्टित है, इसी से सब अवस्था का अनुभव नहीं करता, मृत्यु समय जब जीवत्व नष्ट हो जाता है तब मृतक होता है। तो जो ऐसा हो तो परलोक का अनुभव न